दिल्ली तो चारों तरफ से घिरी हुई, लेकिन मुंबई में क्यों बढ़ रहा प्रदूषण? जानें वजह
देश की राजधानी दिल्ली इस समय अपने इतिहास के सबसे गंभीर पर्यावरणीय और स्वास्थ्य संकट से गुजर रही है. 2025 की सर्दियों में ठंड और प्रदूषण की दोहरी मार ने जनजीवन को बुरी तरह प्रभावित किया है.
सुबह और शाम घना कोहरा और स्मॉग मिलकर दृश्यता लगभग शून्य कर देते हैं, जिससे सड़क, रेल और हवाई यातायात तक प्रभावित हो रहा है. सांस लेना मुश्किल हो चुका है और अस्पतालों में श्वसन रोगियों की संख्या बढ़ रही है.
इसी बीच मुंबई का नाम भी प्रदूषण की चर्चा में आना चिंता को और गहरा करता है. मुंबई को लंबे समय तक समुद्री हवाओं का फायदा मिलता रहा है. अरब सागर से आने वाली हवाएं प्रदूषकों को फैलाकर हवा को अपेक्षाकृत साफ रखती थीं.
लेकिन पिछले कुछ वर्षों में यह प्राकृतिक सुरक्षा कमजोर पड़ती दिख रही है. नवंबर की तुलना में हालात भले थोड़े बेहतर हों, लेकिन कई इलाकों में AQI अब भी 150 के आसपास बना हुआ है, जो स्वास्थ्य के लिए नुकसानदेह श्रेणी में आता है.
यह संकेत है कि समस्या अस्थायी नहीं, बल्कि संरचनात्मक बनती जा रही है. मुंबई में हवा खराब होने की सबसे बड़ी वजह तेजी से बढ़ती गाड़ियों की संख्या है. शहर में निजी वाहनों का बोझ लगातार बढ़ रहा है, जबकि ट्रैफिक जाम अब रोजमर्रा की बात हो गई है.
धीमी रफ्तार में चलती गाड़ियां ज्यादा धुआं छोड़ती हैं, जिससे नाइट्रोजन ऑक्साइड और पीएम 2.5 जैसे सूक्ष्म कण हवा में जमा हो जाते हैं. सार्वजनिक परिवहन मजबूत होने के बावजूद लास्ट-माइल कनेक्टिविटी कमजोर है, जिसके चलते लोग निजी वाहन इस्तेमाल करने को मजबूर हैं.
मुंबई में मेट्रो, कोस्टल रोड, रीडेवलपमेंट प्रोजेक्ट और ऊंची इमारतों का निर्माण तेजी से चल रहा है. इन निर्माण स्थलों से उड़ने वाली धूल हवा की गुणवत्ता को गंभीर रूप से प्रभावित कर रही है. कई जगहों पर धूल नियंत्रण के नियम कागजों तक सीमित हैं. खुले मलबे, अधूरी ढकाई और कमजोर निगरानी के कारण सूक्ष्म कण सीधे सांस के जरिए शरीर में पहुंच रहे हैं.