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बॉर्डर पर लगे तारों पर कांच की खाली बोतलें क्यों टांगी जाती हैं, क्या है इसकी वजह?

निधि पाल   |  04 Feb 2026 08:35 AM (IST)
बॉर्डर पर लगे तारों पर कांच की खाली बोतलें क्यों टांगी जाती हैं, क्या है इसकी वजह?

भारत की लंबी सीमाएं कई बार घने जंगलों, पहाड़ी इलाकों और दूर-दराज क्षेत्रों से होकर गुजरती हैं. इन इलाकों में हर जगह हाईटेक सेंसर या कैमरे लगाना आसान नहीं होता है. ऐसे में सुरक्षा बल सालों से एक सरल लेकिन कारगर उपाय अपनाते आए हैं. सीमा पर लगे कंटीले तारों पर कांच की खाली बोतलें टांग दी जाती हैं, आइए जानें कि जवान ऐसा क्यों करते हैं.

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जब कोई व्यक्ति, घुसपैठिया या जंगली जानवर तारों को छूता है या पार करने की कोशिश करता है, तो लटकी हुई बोतलें आपस में टकराने लगती हैं. कांच की टकराहट से तेज खनक पैदा होती है.

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रात के सन्नाटे में यह आवाज काफी दूर तक सुनाई देती है. यही आवाज सीमा पर तैनात जवानों के लिए चेतावनी का काम करती है और वे तुरंत सतर्क हो जाते हैं. सीमा के कई हिस्सों में बिजली की सप्लाई हर वक्त मौजूद नहीं होती है.

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बारिश, बर्फबारी या खराब मौसम में हाईटेक सिस्टम फेल भी हो सकते हैं, लेकिन कांच की बोतलों को किसी बिजली, बैटरी या नेटवर्क की जरूरत नहीं होती है.

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ये चौबीसों घंटे, हर मौसम में काम करती रहती हैं. यही वजह है कि इन्हें एक भरोसेमंद बैकअप सुरक्षा व्यवस्था माना जाता है. कांच की खाली बोतलें आसानी से मिल जाती हैं और इन्हें लगाने में ज्यादा खर्च भी नहीं आता है.

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महंगे सेंसर, थर्मल कैमरे और अलार्म सिस्टम के मुकाबले यह तरीका बेहद किफायती है. कम लागत में बड़ी सुरक्षा देने की वजह से इसे आज भी कई सीमावर्ती इलाकों में अपनाया जाता है.

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सीमा के आसपास जंगली जानवरों की आवाजाही आम बात है. कई बार जानवरों की हरकत और घुसपैठ में फर्क करना मुश्किल हो जाता है. बोतलों की आवाज से जवानों को यह अंदाजा लग जाता है कि तारों के पास कोई हलचल हुई है. इसके बाद स्थिति के हिसाब से जरूरी कदम उठाए जाते हैं.

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यह तरीका कोई नया नहीं है. पुराने समय से गांवों, खेतों और सीमावर्ती इलाकों में इस तरह के देसी अलार्म इस्तेमाल होते रहे हैं. तकनीक के इस दौर में भी यह साबित करता है कि सादगी और अनुभव से निकले उपाय कई बार सबसे ज्यादा भरोसेमंद होते हैं.

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