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प्लेटफॉर्म पर खड़ी पैसेंजर ट्रेन का इंजन क्यों चलता रहता है, क्या इससे ईंधन बर्बाद नहीं होता या कुछ और है वजह?

निधि पाल   |  24 Jan 2026 08:26 AM (IST)
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अक्सर लोग सोचते हैं कि ट्रेन का इंजन कार या बस की तरह है, जिसे जब चाहें बंद कर दिया जाए, लेकिन रेलवे का लोकोमोटिव एक बेहद जटिल मशीन होता है. इसे चालू रखना कई बार बंद करने से ज्यादा सुरक्षित और किफायती साबित होता है. खासकर डीजल इंजन वाली ट्रेनों में यह फैसला सोच-समझकर लिया जाता है.

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डीजल लोकोमोटिव को पूरी क्षमता में आने के लिए समय चाहिए. इंजन बंद होने के बाद उसे दोबारा स्टार्ट करने में करीब 15 से 20 मिनट लग सकते हैं. इस दौरान काफी मात्रा में डीजल खर्च होता है. कई मामलों में जितना ईंधन स्टार्टिंग में लगता है, उतने में इंजन घंटों तक हल्की गति से चल सकता है. इसलिए छोटे स्टॉप पर इंजन बंद करना ईंधन बचत नहीं, बल्कि नुकसान बन जाता है.

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ट्रेन के ब्रेक सिस्टम हवा के दबाव पर काम करते हैं. यह दबाव इंजन से जुड़े एयर कंप्रेसर से लगातार बनता रहता है. अगर इंजन बंद कर दिया जाए तो ब्रेक पाइप में हवा का प्रेशर धीरे-धीरे कम होने लगता है.

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दबाव घटते ही ट्रेन के अपने आप खिसकने का खतरा बढ़ जाता है, जो स्टेशन जैसे भीड़भाड़ वाले इलाके में गंभीर हादसे की वजह बन सकता है. डीजल इंजनों में बड़ी बैटरियां लगी होती हैं, जो सिग्नलिंग, कंट्रोल पैनल, लाइट्स और सेफ्टी सिस्टम को चलाती हैं.

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ये बैटरियां इंजन के चालू रहने पर ही चार्ज होती हैं. इंजन बंद रहने पर बैटरी डिस्चार्ज हो सकती है. अगर बैटरी पूरी तरह डाउन हो जाए तो ट्रेन को दोबारा चालू करना मुश्किल हो सकता है और तकनीकी फेल्योर की स्थिति बन सकती है.

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लोकोमोटिव को बार-बार बंद और चालू करना उसके मैकेनिकल और इलेक्ट्रॉनिक सिस्टम पर अतिरिक्त दबाव डालता है. इससे इंजन की उम्र घटती है और अचानक खराबी आने की संभावना बढ़ जाती है. रेलवे में प्राथमिकता समय पर और सुरक्षित संचालन की होती है, न कि हर स्टॉप पर इंजन बंद करने की.

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उत्तर भारत और पहाड़ी क्षेत्रों में सर्दियों के दौरान तापमान काफी नीचे चला जाता है. ऐसे में इंजन के कूलेंट या पाइपलाइन के जमने का खतरा रहता है. कई रूट्स पर एंटी-फ्रीज सिस्टम पूरी तरह उपलब्ध नहीं होता, इसलिए इंजन को चालू रखना जरूरी हो जाता है ताकि सिस्टम सुरक्षित रहे.

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