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ब्राउन बैग कैसे बन गए शॉपिंग की पहचान? रोज इस्तेमाल करने वाले भी इस राज से अनजान

निधि पाल   |  09 Feb 2026 05:15 PM (IST)
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आज ब्राउन शॉपिंग बैग हमारी आदतों का हिस्सा बन चुके हैं. किराना स्टोर, कपड़ों की दुकान, मेडिकल शॉप या ऑनलाइन डिलीवरी हर जगह यही बैग दिखाई देते हैं. धीरे-धीरे यह रंग शॉपिंग का प्रतीक बन गया है. इसके पीछे कोई फैशन ट्रेंड नहीं, बल्कि जरूरत, लागत और पर्यावरण से जुड़ी सोच काम करती है.

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असल वजह रिसाइकलिंग से शुरू जाती है. ज्यादातर पेपर बैग रिसाइकल कागज से बनाए जाते हैं. रिसाइकल कागज का प्राकृतिक रंग भूरा होता है क्योंकि इसमें अखबार, पुराने कार्डबोर्ड और इस्तेमाल किए गए कागज मिलाए जाते हैं. इन सबका मिश्रण मिलकर वही ब्राउन शेड बनाता है, जिसे बदले बिना इस्तेमाल कर लिया जाता है.

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सफेद कागज बनाने के लिए ब्लीच और केमिकल का इस्तेमाल किया जाता है. यह प्रक्रिया न सिर्फ महंगी होती है, बल्कि पर्यावरण के लिए भी नुकसानदेह होती है. ब्राउन बैग में यह स्टेप नहीं अपनाया जाता.

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बिना ब्लीच किया हुआ कागज ज्यादा मजबूत रहता है और इसकी लागत भी कम होती है. इसी वजह से दुकानदार और कंपनियां ब्राउन बैग को प्राथमिकता देती हैं. ब्राउन शॉपिंग बैग आमतौर पर क्राफ्ट पेपर से बनाए जाते हैं. क्राफ्ट पेपर लकड़ी के गूदे से बनता है और इसमें प्राकृतिक फाइबर ज्यादा होते हैं.

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यही कारण है कि ये बैग वजन सहने में मजबूत होते हैं. प्लास्टिक के मुकाबले ये आसानी से फटते नहीं और कपड़े, किताबें या ग्रोसरी रखने के लिए ज्यादा भरोसेमंद माने जाते हैं. दुकानदारों के लिए लागत बहुत मायने रखती है.

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ब्राउन पेपर बैग बनाना सफेद या रंगीन बैग की तुलना में सस्ता पड़ता है. न तो अतिरिक्त रंग चाहिए, न प्रिंटिंग जरूरी होती है. छोटे दुकानदार से लेकर बड़े ब्रांड तक, सभी के लिए यह एक किफायती विकल्प है.

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प्लास्टिक बैग जहां सालों तक मिट्टी में नहीं घुलते, वहीं पेपर बैग आसानी से गल जाते हैं. ब्राउन बैग खासतौर पर कंपोस्ट के लिए बेहतर माने जाते हैं. इन्हें छोटे टुकड़ों में काटकर मिट्टी या गोबर में मिलाया जाए तो ये धीरे-धीरे खाद में बदल जाते हैं. इसी वजह से सरकार और पर्यावरण विशेषज्ञ भी पेपर बैग को बढ़ावा दे रहे हैं.

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