चांदी काली पड़ जाती है लेकिन सोने का रंग क्यों नहीं उतरता, क्या है इसका साइंस?

गहनों के शौकीनों ने अक्सर देखा होगा कि संदूक या लॉकर में रखी चांदी समय के साथ अपनी चमक खो देती है और काली पड़ जाती है, जबकि सोने के आभूषण सालों-साल वैसे ही चमकते रहते हैं. वैश्विक स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते भू-राजनीतिक तनाव के कारण घरेलू बाजार में सोने और चांदी की कीमतों में भारी उतार-चढ़ाव देखने को मिल रहा है. इंडिया बुलियन के मुताबिक, वर्तमान में 10 ग्राम सोने की कीमत 59,340 रुपये और एक किलोग्राम चांदी का भाव 72,270 रुपये के आसपास चल रहा है. दामों के इस उतार-चढ़ाव के बीच इन दोनों कीमती धातुओं के रंग बदलने और चमक बने रहने के पीछे का वैज्ञानिक कारण बेहद दिलचस्प है.
वैश्विक स्तर पर अमेरिका और ईरान के बीच बढ़ते राजनीतिक तनाव का असर सीधे तौर पर सर्राफा बाजार पर दिखाई दे रहा है. इस तनाव की वजह से इस हफ्ते सोने और चांदी की कीमतों में लगातार उतार-चढ़ाव दर्ज किया गया है.
इंडिया बुलियन एंड ज्वैलर्स एसोसिएशन के आंकड़ों के अनुसार, फिलहाल बाजार में 24 कैरेट सोने की कीमत 59,340 रुपये प्रति 10 ग्राम पर टिकी हुई है, जबकि शुद्ध चांदी का भाव 72,270 रुपये प्रति किलोग्राम बना हुआ है. हालांकि, अलग-अलग राज्यों और शहरों में स्थानीय टैक्स और मेकिंग चार्ज की वजह से इन कीमतों में थोड़ा अंतर देखने को मिल सकता है.
चांदी के बर्तनों या गहनों का रंग वक्त के साथ काला पड़ने की वैज्ञानिक प्रक्रिया को टार्निशिंग कहा जाता है. यह पूरी तरह से एक रासायनिक प्रतिक्रिया (केमिकल रिएक्शन) है. जब चांदी हवा में मौजूद हाइड्रोजन सल्फाइड गैस या अन्य सल्फर यौगिकों के सीधे संपर्क में आती है, तो दोनों के बीच क्रिया होती है.
इस रासायनिक प्रक्रिया के कारण चांदी की सबसे ऊपरी सतह पर सिल्वर सल्फाइड की एक बहुत बारीक और धुंधली काली परत जम जाती है. इसी परत की वजह से चांदी के चमकीले गहने धीरे-धीरे अपनी चमक खोकर पूरी तरह काले दिखाई देने लगते हैं.
कई लोगों के मन में यह सवाल उठता है कि साफ-सुथरे घरों के भीतर हवा में सल्फर कहां से आता है. विज्ञान के अनुसार, हमारे आसपास फैले वायु प्रदूषण के अलावा इंसानी पसीने, परफ्यूम, डियोड्रेंट और सौंदर्य प्रसाधनों में भी सल्फर के अंश पाए जाते हैं.
जब मौसम में नमी (ह्यूमिडिटी) और गर्मी बढ़ जाती है, तो चांदी और सल्फर के बीच होने वाली यह रासायनिक प्रतिक्रिया और ज्यादा तेज हो जाती है. यही वजह है कि बरसात और गर्मी के मौसम में लॉकर में रखी चांदी भी बहुत तेजी से काली पड़ने लगती है और उसे दोबारा चमकाना मुश्किल हो जाता है.
सोने के आभूषणों का रंग कभी फीका न पड़ने का सबसे बड़ा कारण उसका आंतरिक रासायनिक गुण है. विज्ञान की भाषा में सोने को एक नोबल धातु यानी उत्कृष्ट धातु माना गया है. इसका सीधा मतलब यह है कि सोना प्रकृति में मौजूद अन्य तत्वों के मुकाबले सबसे कम प्रतिक्रियाशील (Least Reactive) होता है.
हवा में कितनी भी नमी, ऑक्सीजन या खतरनाक सल्फर गैस मौजूद हो, सोने की सतह उनसे कोई रिएक्शन नहीं करती है. इस बेजोड़ रासायनिक स्थिरता के कारण सोने पर न तो कभी सल्फाइड की परत चढ़ती है और न ही ऑक्साइड की.
सोने की परमाणु संरचना (एटॉमिक स्ट्रक्चर) को देखें तो इसके न्यूक्लियस के चारों तरफ मौजूद बाहरी इलेक्ट्रॉन्स का फॉरमेशन बहुत ज्यादा स्थिर और मजबूत होता है. अत्यंत स्थिर होने के कारण सोना किसी भी अन्य बाहरी तत्व के साथ नया रासायनिक बंधन (केमिकल बॉन्ड) बनाने के लिए अपने इलेक्ट्रॉन्स को आसानी से नहीं छोड़ता है.
इलेक्ट्रॉन्स के इसी मजबूत जुड़ाव के कारण सोने में कभी भी संक्षारण (Corrosion) यानी जंग लगने की समस्या नहीं होती है. यही वजह है कि मिट्टी या पानी में सदियों तक दबे रहने के बाद भी सोने की चमक बिल्कुल नई जैसी बनी रहती है.