Eye Colour: क्यों होता है कुछ लोगों की आंखों का रंग नीला, जानें आंखों के अलग अलग रंगों की वजह
जिन लोगों की आंखें नीली होती हैं उनमें नीला पिगमेंट नहीं होता. इसके बजाय उनकी आइरिस में काफी कम मेलानिन होता है, जिस वजह से रोशनी आंख के अंदर फैलती है. यही फैलाव नीले रंग को बनाता है.
नीली आंखों के पीछे का विज्ञान वही घटना है जो आसमान के रंग के लिए जिम्मेदार है. जब रोशनी कम मेलानिन वाली आइरिस में आती है तो छोटी वेवलेंथ वाली नीली रोशनी फैलती है और रिफ्लेक्ट होती है. वही लाल और हरे रंग जैसी लंबी वेवलेंथ वाली रोशनी अब्जॉर्ब हो जाती है. यही ऑप्टिकल प्रभाव नीले रंग का भ्रम पैदा करता है.
भूरी आंखें दुनिया में सबसे ज्यादा आम है. ऐसा इसलिए क्योंकि इनमें बड़ी मात्रा में मेलानिन होता है. ज्यादा मेलानिन का मतलब है गहरे रंग. मेलानिन की यह ज्यादा मात्रा यूवी रेडिएशन से बेहतर सुरक्षा भी देती है.
हरी आंखें तब होती है जब आइरिस में कम मेलानिन होता है. लेकिन इसमें लिपोक्रोम नाम का एक पीला पिगमेंट भी शामिल होता है. जब नीली रोशनी का फैलाव इस पिले पिगमेंट के साथ मिलता है तब हरा रंग दिखाई देता है.
हेजल आंखें रोशनी के आधार पर हरे, भूरे और सुनहरे रंग के बीच बदलती हुई लगती हैं. ऐसा मध्यम मेलानिन स्तर के साथ-साथ आइरिस के चारों तरफ पिगमेंट के समान बंटवारे की वजह से होता है. आइरिस अंदर कई परतें रोशनी को अलग-अलग तरह से बिखेरती हैं. इससे कई रंग वाला कभी-कभी चमकने वाले इफेक्ट बनता है.
आंखों का रंग किसी एक जीन से तय नहीं होता. यह कई जीनों के जटिल तालमेल से कंट्रोल होता है. क्रोमोसोम 15 पर मौजूद दो मुख्य जीन OCA2 और HERC2 मेलानिन के लेवल को रेगुलेट करने में बड़ी भूमिका निभाते हैं.