शराब पीने से पहले दो बूंद जमीन पर क्यों गिराते हैं, कहां से शुरू हुई ये परंपरा?
भारत के कई हिस्सों में शराब का गिलास हाथ में आते ही लोग उंगलियों से कुछ बूंदें बाहर छिड़कते दिख जाते हैं. अक्सर इसे एक स्वाभाविक हरकत समझ लिया जाता है, लेकिन इस छोटे से कर्म के पीछे गहरा सांस्कृतिक और आध्यात्मिक इतिहास है.
माना जाता है कि धरती पर गिराई गई पहली बूंदें किसी अदृश्य शक्ति को समर्पित होती हैं, मानो पीने वाला व्यक्ति कह रहा हो कि यह घूंट मेरे लिए, और इसकी पहली निशानी उन शक्तियों के नाम, जो मुझे सुरक्षित रखें.
भारत में इस परंपरा को भैरवनाथ की पूजा से भी जोड़कर देखा गया है. पौराणिक मान्यताओं के अनुसार, भैरवनाथ उन शक्तियों के रक्षक माने जाते हैं जो साधकों को नकारात्मक ऊर्जा और मानसिक उलझनों से बचाती हैं.
शराब छिड़कने को उनके प्रति सम्मान और सुरक्षा की कामना के प्रतीक के रूप में देखा जाता था. समय के साथ यह धार्मिक परंपरा धीरे-धीरे आम सामाजिक आदत में बदल गई.
दिलचस्प बात यह है कि यह प्रथा केवल भारत की नहीं है. यूरोप, अफ्रीका और अमेरिका के कई हिस्सों में भी शराब या किसी पेय को पहले जमीन पर अर्पित करने की परंपरा रही है, जिसे वहां लाइबेशन कहा जाता है.
कैम्ब्रिज डिक्शनरी ‘लाइबेशन’ को मृतकों या देवताओं की स्मृति में अर्पित की जाने वाली शराब के रूप में परिभाषित करती है. ग्रीस और रोम की प्राचीन सभ्यताओं में लोग पीने से पहले देवताओं के नाम शराब टपकाते थे, ताकि आगामी यात्रा, युद्ध या समारोह के लिए उनका आशीर्वाद मिले.
अफ्रीकी देशों में इस परंपरा को पूर्वजों के प्रति सम्मान के रूप में निभाया जाता रहा है. अमेरिका में कई समुदाय आज भी किसी महत्वपूर्ण क्षण पर जमीन पर शराब की कुछ बूंदें गिराकर अपने दिवंगत प्रियजनों को याद करते हैं.
यानी यह परंपरा वैश्विक है. शराब का पहला अंश किसी ‘ऊपर वाली शक्ति’ या ‘अनदेखे रक्षक’ को समर्पित किया जाता है. भारत के ग्रामीण इलाकों में एक मान्यता यह भी है कि शराब की प्रथम बूंदें छिड़कने से बुरी नजर दूर रहती है.
माना जाता है कि शराब में ‘आकर्षण’ की ऊर्जा होती है जो किसी भी नकारात्मकता को खींच सकती है, इसलिए उसका एक छोटा हिस्सा जमीन को अर्पित कर दिया जाता है ताकि वह नकारात्मक प्रभाव वहीं समाप्त हो जाए और पीने वाला सुरक्षित रहे.