पुराने समय में लंबे बाल क्यों रखते थे लड़के, क्या है इसके पीछे का साइंस?
प्राचीन सभ्यताओं में बालों को शरीर का सामान्य हिस्सा नहीं, बल्कि शक्ति और व्यक्तित्व का प्रतीक माना जाता था. यूनान, भारत, यूरोप और रोम जैसी संस्कृतियों में लंबे बाल पुरुषों की पहचान का अहम हिस्सा थे.
माना जाता था कि जो व्यक्ति अपने बाल लंबे रख सकता है, वह स्वतंत्र है और सामाजिक रूप से मजबूत स्थिति में है. प्राचीन यूनान में लंबे बाल पुरुषों की ताकत और वीरता का प्रतीक माने जाते थे. योद्धा और स्वतंत्र नागरिक लंबे बाल रखते थे, जबकि गुलामों के बाल छोटे काट दिए जाते थे.
इसी तरह जर्मनिक जनजातियों और मध्यकालीन यूरोप में लंबे बाल स्वतंत्र और सम्मानित पुरुषों की पहचान थे. छोटे बाल अक्सर दासता या निचले सामाजिक वर्ग से जोड़े जाते थे. भारत में लंबे बालों को आध्यात्मिक ऊर्जा से जोड़ा गया.
ऋषि-मुनि और तपस्वी बाल बढ़ाकर रखते थे. मान्यता थी कि बाल सूर्य की ऊर्जा को ग्रहण कर मस्तिष्क तक पहुंचाते हैं, जिससे एकाग्रता और स्मरण शक्ति बढ़ती है. सिर पर शिखा रखने की परंपरा भी इसी सोच से जुड़ी मानी जाती है, जिससे मस्तिष्क का संवेदनशील हिस्सा सुरक्षित रहता है.
सिख धर्म में केश रखना आस्था, सत्य और आत्मसम्मान का प्रतीक है. यह संदेश देता है कि इंसान खुद को प्राकृतिक रूप में स्वीकार करे. योग और ध्यान से जुड़ी परंपराओं में भी लंबे बालों को मानसिक संतुलन और अनुशासन से जोड़कर देखा गया.
वैज्ञानिक रूप से बालों को शरीर का मृत हिस्सा माना जाता है, लेकिन तंत्रिका तंत्र और त्वचा से जुड़े होने के कारण वे संवेदनशील होते हैं. कुछ शोध बताते हैं कि बाल तापमान संतुलन और बाहरी प्रभावों से सिर की रक्षा करते हैं.
हालांकि ऊर्जा एंटीना जैसी मान्यताएं वैज्ञानिक रूप से सिद्ध नहीं हैं, लेकिन यह साफ है कि बालों का महत्व सिर्फ सुंदरता तक सीमित नहीं रहा था. प्राचीन रोम और यूरोप में लंबे बाल अमीरी और ऊंचे सामाजिक दर्जे की निशानी थे.
लंबे बालों की देखभाल आसान नहीं थी, इसके लिए समय और संसाधन चाहिए होते थे, इसलिए जिनके पास नौकर या पर्याप्त साधन होते थे, वही लंबे बाल रख पाते थे. इस तरह बाल समाज में हैसियत दिखाने का जरिया भी बन गए थे.