एक ट्रेन में क्यों लगाए जाते हैं दो-दो इंजन, कैसे किया जाता है इन्हें कंट्रोल?
भारतीय रेलवे में जब किसी ट्रेन में दो इंजन लगाए जाते हैं, तो इसे मल्टीपल यूनिट ऑपरेशन कहा जाता है. इसका इस्तेमाल खासकर उन ट्रेनों में किया जाता है जो बहुत लंबी दूरी तय करती हैं या जिनका वजन ज्यादा होता है, जैसे मालगाड़ियां, पहाड़ी रूट की ट्रेनें, या फिर लंबे सफर की सुपरफास्ट ट्रेनें.
अब सवाल यह उठता है कि अगर दो इंजन लगाए गए हैं, तो क्या दोनों को अलग-अलग ड्राइवर चलाते हैं? इसका जवाब है- नहीं. दोनों इंजन एक ही ड्राइवर के कंट्रोल में होते हैं.
इसमें पहले इंजन को लीड इंजन और दूसरे को ट्रेल इंजन कहा जाता है. ये दोनों आपस में MU Cable या मल्टीपल यूनिट केबल से जुड़े होते हैं, जिससे पहले इंजन की हर कमांड जैसे एक्सेलरेटर, ब्रेक या हॉर्न दूसरे इंजन तक भी एक साथ पहुंचती है.
रेलवे के इंजीनियर बताते हैं कि जब ट्रेन बहुत भारी होती है, जैसे कोयला, सीमेंट या तेल से भरी मालगाड़ियों में तो एक इंजन की खींचने की क्षमता सीमित होती है. ऐसे में डबल हेडिंग या पुश-पुल टेक्निक का इस्तेमाल किया जाता है.
इसमें एक इंजन आगे खींचता है और दूसरा पीछे से धक्का देता है, जिससे ट्रेन पर बराबर दबाव पड़ता है और स्पीड और बैलेंस दोनों कायम रहते हैं.
पहाड़ी इलाकों जैसे दार्जिलिंग, कोंकण या हिमालयन रूट्स पर दो इंजन इसलिए लगाए जाते हैं ताकि ट्रेन को ऊंचाई पर चढ़ने में ज्यादा ताकत मिल सके. वहीं, डाउनहिल यानी नीचे उतरते समय ये इंजन ट्रेन को ब्रेकिंग पावर में मदद करते हैं ताकि ट्रेन नियंत्रण में रहे.
दिलचस्प बात यह है कि पहले इस सिस्टम को मैन्युअल कंट्रोल से चलाया जाता था, लेकिन अब आधुनिक ट्रेनों में डिजिटल इंटरफेस और सैटेलाइट सिंक्रोनाइजेशन के जरिए दोनों इंजनों को एक साथ नियंत्रित किया जा सकता है. इससे न सिर्फ ट्रेन की गति स्थिर रहती है, बल्कि ईंधन की बचत और सुरक्षा भी सुनिश्चित होती है.