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Whiskey War: न गोला न बारूद…व्हिस्की से 38 साल तक दो देशों ने लड़ी दुनिया की सबसे अजीबोगरीब जंग

निधि पाल   |  08 Apr 2026 06:29 PM (IST)
Whiskey War: न गोला न बारूद…व्हिस्की से 38 साल तक दो देशों ने लड़ी दुनिया की सबसे अजीबोगरीब जंग

Whiskey War: आज के दौर में जब अमेरिका और ईरान के बीच युद्धविराम की खबरें सुर्खियां बटोर रही हैं, तब इतिहास के पन्नों से एक ऐसी जंग निकलकर आती है जो किसी मजाक से कम नहीं लगती है. बिना किसी मिसाइल और बिना किसी सिपाही की जान लिए लड़ी गई यह जंग पूरे 38 सालों तक चली. इस युद्ध का हथियार गोला-बारूद नहीं, बल्कि व्हिस्की की बोतलें थीं. हंस आइलैंड के नाम पर कनाडा और डेनमार्क ने जिस तरह अपनी संप्रभुता का प्रदर्शन किया, वह दुनिया की सबसे अनोखी और मजेदार कहानियों में से एक है.

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कनाडा और ग्रीनलैंड के बीच बर्फीले पानी में एक छोटा सा द्वीप स्थित है, जिसका नाम 'हंस आइलैंड' है. महज 1200 वर्ग मीटर के इस पत्थर के टुकड़े का महत्व इसलिए बढ़ गया क्योंकि यह कनाडा के एल्समियर आइलैंड और डेनमार्क के अधीन आने वाले ग्रीनलैंड से लगभग बराबर दूरी (18 किलोमीटर) पर है.

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अंतरराष्ट्रीय कानून के मुताबिक, दोनों देशों के पास इस पर दावा करने का कानूनी आधार था. यही वह वजह थी जिसने दो शांतिप्रिय देशों के बीच एक लंबे लेकिन मजेदार क्षेत्रीय विवाद को जन्म दिया. शुरुआत में जब इस द्वीप को लेकर खींचतान बढ़ी, तो 1973 में कनाडा और डेनमार्क के बीच एक औपचारिक संधि हुई.

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इस संधि के तहत तय किया गया कि द्वीप के दोनों किनारों से समुद्री रेखाएं शुरू होंगी, लेकिन खुद हंस आइलैंड पर किसका अधिकार होगा, इस पर कोई स्पष्ट फैसला नहीं हो सका. दोनों देशों ने इसे भविष्य के लिए टाल दिया और सहमति बनी कि फिलहाल इस पर किसी का हक नहीं होगा. हालांकि, यह समझौता शांति तो लाया, लेकिन हक की असली लड़ाई अभी बाकी थी.

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इस अनोखी जंग की औपचारिक शुरुआत 1984 में हुई. कनाडा के सैनिकों ने हंस आइलैंड का दौरा किया और वहां अपना राष्ट्रीय ध्वज फहरा दिया, लेकिन उन्होंने वहां केवल झंडा ही नहीं छोड़ा, बल्कि कनाडाई व्हिस्की की एक बोतल भी रख दी. यह एक तरह का कूटनीतिक संदेश था कि यह इलाका कनाडा का है.

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यह कदम भले ही आक्रामक नहीं था, लेकिन इसने डेनमार्क को जवाब देने के लिए उकसाया और यहीं से 'व्हिस्की वॉर' का वह सिलसिला शुरू हुआ जो दशकों तक चला. कनाडा की व्हिस्की वाली चुनौती का जवाब डेनमार्क ने बड़े ही दिलचस्प तरीके से दिया. डेनमार्क के ग्रीनलैंड अफेयर्स मंत्री खुद उस टापू पर पहुंचे.

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उन्होंने वहां से कनाडा का झंडा हटाकर डेनमार्क का झंडा लगा दिया. कनाडाई व्हिस्की की जगह उन्होंने वहां 'डैनिश श्नॉप्स' (डेनमार्क की मशहूर शराब) की एक बोतल रख दी. साथ ही वहां एक पर्ची भी छोड़ी जिस पर लिखा था, डेनमार्क के द्वीप में आपका स्वागत है. यह सिलसिला कई सालों तक चलता रहा- जब भी एक देश का दल वहां जाता, वह दूसरे की शराब पीता और अपनी बोतल छोड़ देता.

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दुनिया के इतिहास में शायद ही कोई ऐसा युद्ध होगा जो इतने सालों तक चला हो और जिसमें एक भी गोली न चली हो. कनाडा और डेनमार्क के सैनिक हंस आइलैंड पर बार-बार जाते रहे, एक-दूसरे के झंडे बदलते रहे और शराब की बोतलें एक्सचेंज करते रहे. यह जंग मीडिया और जनता के बीच 'व्हिस्की वॉर' के नाम से मशहूर हो गई.

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यह दुनिया के लिए एक मिसाल बन गई कि दो देश अपने क्षेत्रीय दावों को बिना किसी हिंसा, नफरत या सैन्य झड़प के भी जीवित रख सकते हैं. साल 2005 तक आते-आते दोनों देशों को एहसास हुआ कि इस छोटे से द्वीप के मुद्दे को अब हमेशा के लिए सुलझा लेना चाहिए. कूटनीतिक स्तर पर बातचीत का नया दौर शुरू हुआ.

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दोनों ही देश नाटो (NATO) के सदस्य थे और उनके बीच अच्छे संबंध थे, इसलिए वे इस विवाद को सुलझाने के लिए गंभीर थे. विशेषज्ञों और मंत्रियों की कई मुलाकातों के बाद एक ऐसा फार्मूला तैयार किया गया जो दोनों पक्षों को मंजूर हो और जिसमें किसी की हार न हो.

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अंततः जून 2022 में वह ऐतिहासिक दिन आया जब इस 38 साल पुराने युद्ध का आधिकारिक अंत हुआ. कनाडा की विदेश मंत्री मेलानी जॉय और डेनमार्क के विदेश मंत्री जेप्पे कोफोड ने मुलाकात की. समझौते के तहत यह तय हुआ कि हंस आइलैंड को लगभग दो बराबर हिस्सों में बांट दिया जाएगा. आइलैंड का आधा हिस्सा डेनमार्क को मिला और आधा कनाडा को. इस समझौते के साथ ही दोनों देशों के बीच एक नई थल सीमा (Land Border) बन गई, जो पहले कभी नहीं थी.

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