भारत का वो राज्य जिसे हाथ तक नहीं लगा पाए अंग्रेज और मुगल, जानिए इसके पीछे की वजह

भारत का इतिहास युद्धों, संधियों और विशाल साम्राज्यों के उत्थान-पतन की कहानियों से भरा पड़ा है. जहां एक ओर मुगलों ने सदियों तक दिल्ली की गद्दी से पूरे हिंदुस्तान पर अपनी धाक जमाई, वहीं अंग्रेजों ने 'फूट डालो और राज करो' की नीति से लगभग पूरे देश को गुलामी की जंजीरों में जकड़ लिया. लेकिन इस विशाल देश के नक्शे पर एक छोटा सा तटीय इलाका ऐसा भी था, जिसे न तो मुगल शासक अपने अधीन कर पाए और न ही ब्रिटिश हुकूमत. वह इलाका है गोवा. आखिर क्या वजह थी कि जो मुगल और अंग्रेज पूरी दुनिया को चुनौती दे रहे थे, वे गोवा की दहलीज पर आकर ठिठक गए? यह कहानी केवल जमीन के टुकड़े की नहीं, बल्कि समुद्री ताकत और वैश्विक कूटनीति की है.
प्राचीन काल में गोवा को गोमंतक के नाम से जाना जाता था. यह क्षेत्र अपनी समृद्ध संस्कृति और बेहतरीन व्यापारिक स्थिति के लिए मशहूर था. सातवाहन, चालुक्य और कदंब जैसे महान राजवंशों ने यहां शासन किया और इसे कला व साहित्य का केंद्र बनाया.
लेकिन 15वीं सदी के अंत में जब वास्कोडिगामा भारत पहुंचा, तो गोवा की किस्मत बदलने वाली थी. साल 1510 में पुर्तगाली गवर्नर अफोंसो द अल्बुकर्क ने बीजापुर सल्तनत से गोवा को छीन लिया.
यहीं से गोवा के उस लंबे सफर की शुरुआत हुई, जिसने इसे शेष भारत के राजनीतिक घटनाक्रमों से बिल्कुल अलग कर दिया. जब हम मुगलों की बात करते हैं, तो उनकी विशाल सेना और घुड़सवारों का जिक्र आता है.
मुगल साम्राज्य उत्तर से लेकर दक्षिण भारत तक फैल चुका था, लेकिन उनकी सबसे बड़ी कमजोरी नौसेना का अभाव था. मुगल मुख्य रूप से जमीनी जंग के माहिर थे. दूसरी ओर, गोवा पर काबिज पुर्तगालियों के पास उस समय की सबसे शक्तिशाली और आधुनिक नौसेना थी. मुगलों ने कभी भी गोवा पर सीधे हमले की हिम्मत नहीं दिखाई, क्योंकि समुद्र में पुर्तगालियों को हराना उनके लिए नामुमकिन था.
इसके अलावा, मुगलों की प्राथमिकता उत्तर और मध्य भारत के उपजाऊ मैदानी इलाके थे, न कि एक छोटा सा तटीय प्रदेश. अंग्रेजों ने भारत के लगभग हर हिस्से को अपनी कॉलोनी बना लिया था, लेकिन गोवा उनके नक्शे से बाहर रहा.
इसके पीछे कोई सैन्य हार नहीं, बल्कि कूटनीतिक और रणनीतिक कारण थे. पुर्तगाली और अंग्रेज दोनों ही यूरोपीय शक्तियां थीं. अंग्रेजों के पास पहले से ही मुंबई, कोलकाता और मद्रास जैसे बड़े और आधुनिक बंदरगाह मौजूद थे.
उन्हें गोवा को जीतने में कोई विशेष लाभ नजर नहीं आया. इसके अलावा, पुर्तगाल और ब्रिटेन के बीच यूरोप में पुराने मैत्रीपूर्ण संबंध थे, जिसे वे भारत में एक छोटे से इलाके के लिए खराब नहीं करना चाहते थे. इसी आपसी समझ की वजह से अंग्रेजों ने कभी गोवा में दखल नहीं दिया.
गोवा पर पुर्तगालियों ने करीब 450 साल तक राज किया, जो भारत में किसी भी विदेशी ताकत द्वारा किया गया सबसे लंबा शासन था. इस लंबी अवधि ने गोवा की सामाजिक और सांस्कृतिक बनावट को पूरी तरह बदल दिया. पुर्तगालियों ने वहां चर्चों का निर्माण कराया, अपनी वास्तुकला पेश की और ईसाई धर्म का व्यापक प्रचार-प्रसार किया.
यही वजह है कि आज भी गोवा की गलियों, पुरानी इमारतों और खान-पान में पुर्तगाली संस्कृति की गहरी छाप दिखाई देती है. जब 1947 में भारत आजाद हुआ, तब भी गोवा पुर्तगाल का ही एक हिस्सा बना रहा, जिसे वे अपना 'विदेशी प्रांत' मानते थे.
आजादी के बाद भारत सरकार ने लगातार पुर्तगाल से बातचीत की कोशिश की कि वे शांतिपूर्वक गोवा को भारत को सौंप दें. लेकिन पुर्तगाल के तानाशाह सालाजार इसके लिए कतई तैयार नहीं थे. अंततः, भारतीय नेतृत्व ने सैन्य कार्रवाई का फैसला लिया.
दिसंबर 1961 में भारतीय सेना ने 'ऑपरेशन विजय' शुरू किया. मात्र 36 घंटों के भीतर पुर्तगाली सेना ने आत्मसमर्पण कर दिया और गोवा आधिकारिक तौर पर भारत का हिस्सा बन गया.
इस तरह, जो काम मुगल और अंग्रेज नहीं कर पाए, वह स्वतंत्र भारत की सेना ने कर दिखाया और गोवा को सदियों की विदेशी गुलामी से मुक्त कराया.