किस देश ने बनाया था दुनिया का पहला किलर ड्रोन? दुश्मन देखते रहे जब हवा से बरसी थी मौत
पहलगाम में पर्यटकों पर आतंकी हमले के बाद भारत ने मई महीने में पाकिस्तान में मौजूद आतंकी ठिकानों पर ऑपरेशन सिंदूर चलाया. इस कार्रवाई में भारतीय सेना ने ड्रोन के जरिए सटीक हमले किए और कई आतंकी कैंप तबाह कर दिए.
जवाब में पाकिस्तान ने भी ड्रोन हमलों की कोशिश की, लेकिन भारत की S-400 एयर डिफेंस प्रणाली ने इन सभी प्रयासों को नाकाम कर दिया. इसके बाद एक बार फिर लोगों के मन में सवाल उठा कि ड्रोन युद्ध की शुरुआत आखिर कब और कहां हुई थी.
ड्रोन को तकनीकी भाषा में अनमैन्ड एरियल व्हीकल यानी UAV कहा जाता है. इसमें पायलट मौजूद नहीं होता और इसे जमीन से रिमोट कंट्रोल या ऑटोमेटिक सिस्टम से उड़ाया जाता है. ड्रोन की सबसे बड़ी ताकत यह है कि यह दुश्मन इलाके में बिना सैनिकों की जान जोखिम में डाले हमला या निगरानी कर सकता है.
यही वजह है कि आज लगभग हर बड़ी सेना ड्रोन तकनीक पर तेजी से काम कर रही है. ड्रोन का विचार कोई नया नहीं है. इसका पहला प्रयोग प्रथम विश्व युद्ध के दौरान हुआ था. साल 1917 में ब्रिटेन ने रेडियो कंट्रोल से उड़ने वाले ‘एरियल टारगेट’ का परीक्षण किया.
इसका मकसद दुश्मन पर हमला नहीं बल्कि तकनीक को परखना था. इसके एक साल बाद यानी 1918 में अमेरिका ने ‘केटरिंग बग’ नाम का एरियल टारपीडो तैयार किया. यह बिना पायलट के उड़कर तय लक्ष्य तक पहुंचने की क्षमता रखता था.
हालांकि अमेरिका और ब्रिटेन ने ड्रोन जैसे हथियारों का सफल परीक्षण कर लिया था, लेकिन इन्हें सीधे युद्ध में इस्तेमाल नहीं किया गया. उस दौर में तकनीक पूरी तरह भरोसेमंद नहीं थी और सटीक निशाना लगाना मुश्किल माना जाता था. फिर भी दुनिया पहली बार इस विचार से परिचित हो गई कि बिना पायलट के भी हवा से हमला किया जा सकता है.
ड्रोन तकनीक में असली बदलाव साल 1935 में देखने को मिला, जब यूनाइटेड किंगडम ने DH.82B ‘क्वीन बी’ नाम का रेडियो कंट्रोल्ड टारगेट ड्रोन तैयार किया. यह ड्रोन वायुसेना की ट्रेनिंग और लक्ष्य अभ्यास के लिए इस्तेमाल किया गया. इसके बाद द्वितीय विश्व युद्ध के दौरान ड्रोन तकनीक में लगातार सुधार होता गया और इसका इस्तेमाल बढ़ता चला गया.