रास्ता भटकने के बाद अंतरिक्ष में कहां गायब हो जाते हैं सैटेलाइट, कहां है इनका कब्रिस्तान?
ISRO के PSLV-C62 मिशन में तीसरे चरण में तकनीकी दिक्कत आने के कारण रॉकेट तय कक्षा में सैटेलाइट्स को स्थापित नहीं कर सका. ऐसे मामलों में यह जरूरी नहीं कि सैटेलाइट सीधे धरती पर गिर जाए.
अंतरिक्ष एजेंसियां पहले यह जांचती हैं कि सैटेलाइट किस स्थिति में है और वह किस ऑर्बिट में पहुंचा है. जापानी स्पेस एजेंसी JAXA समेत सभी अंतरिक्ष एजेंसियां मानती हैं कि हर सैटेलाइट की एक तय डिजाइन लाइफ होती है.
यानी उसे कितने साल काम करना है, यह पहले से तय किया जाता है. कुछ सैटेलाइट तय समय से ज्यादा भी चलते हैं, लेकिन अंत में उन्हें सुरक्षित तरीके से हटाना जरूरी होता है.
अगर कोई सैटेलाइट सही कक्षा में पहुंच तो जाए, लेकिन बाद में कंट्रोल से बाहर हो जाए, तो वह स्पेस डेब्री यानी अंतरिक्ष का कचरा बन जाता है. ऐसे सैटेलाइट्स बिना दिशा के घूमते रहते हैं और दूसरे सक्रिय सैटेलाइट्स के लिए खतरा बन सकते हैं. इसलिए इन्हें लगातार ट्रैक किया जाता है ताकि टकराव से बचा जा सके.
जब किसी सैटेलाइट का ईंधन खत्म हो जाता है, तो वह धीरे-धीरे अपनी ऊंचाई खोने लगता है. कई बार वह धरती के वायुमंडल में घुसते ही जलकर पूरी तरह खत्म हो जाता है. अगर उसके कुछ हिस्से बचने की संभावना होती है, तो उसे नियंत्रित तरीके से गिराया जाता है.
स्पेस जंक को कम करने के लिए संयुक्त राष्ट्र की संस्था UN COPUOS ने गाइडलाइंस बनाई हैं. इनके मुताबिक, किसी भी सैटेलाइट को मिशन खत्म होने के 25 साल के भीतर डी-ऑर्बिट करना जरूरी है. यानी उसे सुरक्षित तरीके से पृथ्वी के वायुमंडल में लाकर खत्म करना या तय जगह पर गिराना होता है.
खराब या डेड सैटेलाइट्स को आमतौर पर पॉइंट नेमो नाम की जगह पर गिराया जाता है. यह दक्षिणी प्रशांत महासागर का सबसे दूरस्थ इलाका है, जहां इंसानी आबादी नहीं के बराबर है. समुद्र बेहद गहरा है और जहाजों की आवाजाही भी बहुत कम होती है. इसी वजह से इसे अंतरिक्ष का कब्रिस्तान कहा जाता है.