मौत से कुछ देर पहले दिमाग में क्या होता है, क्यों आने लगती है अपनों की याद?
वैज्ञानिक रिसर्च बताते हैं कि दिल की धड़कन रुकने के बाद भी दिमाग तुरंत बंद नहीं होता है. आमतौर पर दिमाग करीब 5 से 7 मिनट तक सक्रिय रह सकता है. इस दौरान दिमाग सामान्य स्थिति से अलग तरह से काम करता है.
कई मामलों में यह और ज्यादा सक्रिय हो जाता है, खासकर याददाश्त और चेतना से जुड़े हिस्से. मौत के करीब पहुंचने पर दिमाग में गामा तरंगों की गतिविधि अचानक बढ़ जाती है. गामा तरंगें यादों, सपनों और जागरूकता से जुड़ी होती हैं.
जब ये तेज होती हैं, तो व्यक्ति को ऐसा महसूस हो सकता है जैसे उसकी जिंदगी की अहम घटनाएं एक के बाद एक आंखों के सामने चल रही हों. इसी वजह से कई लोग कहते हैं कि उन्होंने मरते वक्त अपनी पूरी जिंदगी देख ली.
इस स्थिति को वैज्ञानिक भाषा में लाइफ रिकॉल या लाइफ रिव्यू कहा जाता है. इसमें दिमाग बीते जीवन की खास यादों को तेजी से दोहराता है. ये यादें अक्सर भावनात्मक होती हैं, जैसे बचपन, परिवार, माता-पिता, जीवनसाथी या बच्चे. नकारात्मक से ज्यादा सकारात्मक यादें सामने आती हैं, जिससे मन को सुकून मिलता है.
मौत से ठीक पहले शरीर एंडोर्फिन और दूसरे न्यूरोकेमिकल्स छोड़ता है. एंडोर्फिन को शरीर का नेचुरल पेनकिलर कहा जाता है. ये रसायन दर्द, घबराहट और डर को कम कर देते हैं. इसी वजह से कई लोगों को आखिरी समय में शांति, हल्कापन या सपने जैसी स्थिति महसूस होती है. इसे नियर-डेथ एक्सपीरियंस भी कहा जाता है.
मनोवैज्ञानिक मानते हैं कि मौत के करीब दिमाग भावनात्मक सुरक्षा खोजता है. जीवन में सबसे मजबूत भावनात्मक रिश्ता परिवार और करीबी लोगों से होता है. इसलिए आखिरी समय में दिमाग उन्हीं चेहरों और पलों को सामने लाता है, जिनसे जुड़ाव सबसे गहरा होता है. यह दिमाग का खुद को मानसिक रूप से शांत करने का तरीका भी माना जाता है.
कई बार मरते वक्त लोगों को अधूरी इच्छाएं, अनकही बातें या माफी मांगने की चाह याद आती है. इसका कारण यह है कि दिमाग जीवन का आखिरी आत्म-मूल्यांकन करता है. वह उन पलों पर ज्यादा ध्यान देता है, जहां भावनात्मक जुड़ाव था या कोई बात अधूरी रह गई थी. इससे व्यक्ति को भीतर से हल्का होने का अहसास हो सकता है.