उपराष्ट्रपति चुनाव में पार्टियों नहीं जारी करती व्हिप, सांसदों को अपने समर्थन में वोट करने के लिए नहीं कर सकती मजबूर; जानिए क्यों?
लेकिन एक बात जो इस चुनाव को बाकी संसदीय मतदानों से अलग बनाती है, वह यह है कि इसमें राजनीतिक दल अपने सांसदों के लिए व्हिप जारी नहीं कर सकते. इसका मतलब है कि पार्टियां अपने सांसदों को किसी खास उम्मीदवार को वोट देने के लिए मजबूर नहीं कर सकतीं. चलिए जानते हैं कि ऐसा क्यों?
भारत के उपराष्ट्रपति का चुनाव संसद के दोनों सदनों लोकसभा और राज्यसभा के निर्वाचित और नामित सदस्यों द्वारा किया जाता है. यानी इस चुनाव में राज्य की विधानसभाओं की कोई भूमिका नहीं होती. रिक्त पदों को छोड़कर कुल मिलाकर 782 सांसद उपराष्ट्रपति के चुनाव में वोट डालने का अधिकार रखते हैं.
किसी भी उम्मीदवार को जीतने के लिए 391 या उससे अधिक वोट चाहिए होगा. एनडीए के पास 425 सांसद हैं जबकि उसे कुछ अन्य दलों के वोट मिलने का भी भरोसा है.
उपराष्ट्रपति चुनाव में वोटिंग बैलेट पेपर और सिंगल ट्रांसफरेबल वोट सिस्टम के जरिए होती है. इसमें सांसद अपने पसंदीदा उम्मीदवार को प्राथमिकता के आधार पर वोट देते हैं. गुप्त मतदान होने की वजह से कोई नहीं जान सकता कि किस सांसद ने किसे वोट दिया
राष्ट्रपति और उपराष्ट्रपति चुनाव के मामले में कानून साफ कहता है कि व्हिप जारी करना प्रतिबंधित है. सांसदों को यह स्वतंत्रता दी गई है कि वे अपनी समझ और पसंद के आधार पर किसी भी उम्मीदवार को वोट डाल सकते हैं.
व्हिप न होने की वजह से उपराष्ट्रपति चुनाव में क्रॉस वोटिंग की संभावना रहती है. यानी, कोई सांसद अपनी पार्टी के उम्मीदवार के बजाय किसी और को वोट दे सकता है.
बता दें कि भारत के उपराष्ट्रपति पद के लिए 9 सितंबर को मतदान होगा. एनडीए के सीपी राधाकृष्णन और इंडिया गठबंधन के सुदर्शन रेड्डी के बीच मुकाबला है.