देश का कौन-सा राज्य देता है सबसे सस्ते मजदूर, जानें कहां है सबसे ज्यादा बेरोजगारी?

मई दिवस के मौके पर देश के कामगारों की आर्थिक स्थिति और राज्यों में फैली बेरोजगारी को लेकर एक नई बहस छिड़ गई है. राष्ट्रीय जनता दल (RJD) के नेता तेजस्वी यादव ने एनडीए सरकार पर पर हमला बोलते हुए कहा है कि बिहार का नाम अब बदलकर 'श्रमिक प्रदेश' कर दिया जाना चाहिए. उनके इस बयान ने देश में सस्ते श्रम और बेरोजगारी के असल मुद्दों को फिर से चर्चा में ला दिया है. एक तरफ जहां मध्य प्रदेश और गुजरात जैसे राज्यों में सबसे सस्ते मजदूर मिल रहे हैं, वहीं लक्षद्वीप और केरल जैसे क्षेत्रों में युवाओं को रोजगार के लिए भारी संघर्ष करना पड़ रहा है.
देश में अगर सस्ते श्रम की बात करें तो मध्य प्रदेश, गुजरात, त्रिपुरा, नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश जैसे राज्य इस मामले में सबसे आगे हैं. इन राज्यों में ग्रामीण और कृषि कार्यों के लिए मिलने वाली दैनिक मजदूरी राष्ट्रीय औसत की तुलना में काफी कम है.
यहां अकुशल मजदूरों को बहुत ही कम दिहाड़ी पर दिनभर हाड़-तोड़ मेहनत करनी पड़ती है. गैर-कृषि मजदूरों के मामले में मध्य प्रदेश सबसे नीचे है, जहां एक मजदूर को औसतन केवल 246.3 रुपये प्रतिदिन ही मिल पाते हैं.
इसके अलावा गुजरात और त्रिपुरा के कृषि और निर्माण क्षेत्र में भी मजदूरी दरें देश में सबसे निचले स्तर पर बनी हुई हैं. पूर्वोत्तर के नागालैंड और अरुणाचल प्रदेश में भी न्यूनतम मजदूरी की स्थिति ऐसी ही है, जो दिल्ली, केरल और महाराष्ट्र जैसे अधिक वेतन देने वाले राज्यों के मुकाबले काफी दयनीय है.
श्रम ब्यूरो के पीरियॉडिक लेबर फोर्स सर्वे (जुलाई 2023 से जून 2024) की रिपोर्ट के हवाले से देखें तो देश के 24 राज्यों और केंद्र शासित प्रदेशों में 15 से 29 साल के युवाओं की बेरोजगारी दर 10 प्रतिशत से कहीं अधिक है. इसमें सबसे चौंकाने वाला आंकड़ा लक्षद्वीप से आया है, जहां युवाओं में सबसे ज्यादा 36.2 प्रतिशत की बेरोजगारी दर दर्ज की गई है.
लक्षद्वीप में महिलाओं की स्थिति और भी खराब है, जहां महिला बेरोजगारी दर 79.7 प्रतिशत और पुरुष बेरोजगारी दर 26.2 प्रतिशत है. इसके बाद दूसरे नंबर पर अंडमान और निकोबार द्वीप समूह है, जहां कुल युवा बेरोजगारी दर 33.6 प्रतिशत है। यहां भी महिलाओं की बेरोजगारी 49.5 प्रतिशत और पुरुषों की 24 प्रतिशत के उच्च स्तर पर है.
दक्षिण भारत का सबसे साक्षर राज्य केरल भी बेरोजगारी के इस संकट से अछूता नहीं है. रिपोर्ट के मुताबिक केरल में कुल युवा बेरोजगारी दर 29.9 प्रतिशत तक पहुंच गई है, जिसमें महिलाओं की हिस्सेदारी 47.1 प्रतिशत और पुरुषों की 19.3 प्रतिशत है.
इसके अलावा पूर्वोत्तर और पहाड़ी क्षेत्रों में भी स्थिति गंभीर बनी हुई है. नागालैंड में यह आंकड़ा 27.4 प्रतिशत, मणिपुर में 22.9 प्रतिशत, लद्दाख में 22.2 प्रतिशत और अरुणाचल प्रदेश में 20.9 प्रतिशत दर्ज किया गया है.
वहीं देश के अन्य हिस्सों में गोवा 19.1 प्रतिशत, पंजाब 18.8 प्रतिशत और आंध्र प्रदेश 17.5 प्रतिशत की युवा बेरोजगारी दर के साथ टॉप 10 राज्यों की इस सूची में शामिल हैं, जो इन राज्यों में रोजगार के अवसरों की भारी कमी को दिखाता है.
इस गंभीर संकट के बीच देश में कुछ ऐसे भी राज्य हैं जहां बेरोजगारी की दर न्यूनतम स्तर पर है. मध्य प्रदेश इस मामले में सबसे बेहतर स्थिति में दिखाई देता है, जहां बेरोजगारी दर महज 2.6 प्रतिशत है. इसके बाद गुजरात का नंबर आता है, जहां यह आंकड़ा 3.1 प्रतिशत है. इसके अलावा झारखंड में 3.6 प्रतिशत, देश की राजधानी दिल्ली में 4.6 प्रतिशत और छत्तीसगढ़ में 6.3 प्रतिशत बेरोजगारी दर दर्ज की गई है.
दादरा और नगर हवेली में यह 6.6 प्रतिशत, त्रिपुरा में 6.8 प्रतिशत, सिक्किम में 7.7 प्रतिशत, पश्चिम बंगाल में 9 प्रतिशत और उत्तर प्रदेश में 9.8 प्रतिशत है. ये वे राज्य हैं जो युवाओं को रोजगार देने के मामले में अन्य राज्यों की तुलना में काफी आगे रहे हैं.
अगर पूरे देश के स्तर पर बात करें तो भारत में युवाओं की कुल बेरोजगारी दर 10.2 प्रतिशत दर्ज की गई है. इस आंकड़े में एक बड़ा लैंगिक अंतर साफ दिखाई देता है, जहां पुरुषों की तुलना में महिलाएं काम की तलाश में ज्यादा भटक रही हैं. देश में जहां कुल पुरुषों की बेरोजगारी दर 9.8 प्रतिशत है, वहीं महिलाओं के मामले में यह आंकड़ा बढ़कर 11 प्रतिशत तक पहुंच गया है.
यह आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं कि उच्च शिक्षा के बावजूद महिलाओं के लिए कार्यबल में शामिल होने के अवसर आज भी काफी सीमित हैं. इस असंतुलन को दूर करने के लिए देश में अधिक रोजगार और बेहतर मजदूरी दरें सुनिश्चित करना बेहद जरूरी हो गया है.