American Delta Force: कैसे होती है अमेरिकी डेल्टा फोर्स की ट्रेनिंग, भारत में इसके मुकाबले कौन से कमांडो?
डेल्टा फोर्स आम मिलिट्री पूल से भर्ती नहीं करती है. उम्मीदवार आमतौर पर 75th रेंजर रेजीमेंट और यूनाइटेड स्टेट्स आर्मी स्पेशल फोर्सज जैसे एलिट यूनिट्स से आते हैं. हालांकि तकनीकी रूप से यह दूसरी ब्रांच के लिए भी खुला है लेकिन उम्मीद यह होती है कि उन्हें हाई रिस्क वाले युद्ध के माहौल में पहले से ही अनुभव हो.
सिलेक्शन का दौर लगभग 4 हफ्तों तक चलता है और जानबूझकर इसे काफी रहस्यमय रखा जाता है. बेसिक फिजिकल टेस्ट पुश-अप्स, सिट-अप्स और 3.2 किमी की दौड़ सिर्फ वार्म अप होते हैं. असली फिल्टर उबड़-खाबड़ इलाके में रात में लैंड नेविगेशन है. इसमें दूरियां बढ़ती हैं और वजन 35 से 45 पाउंड तक बढ़ जाता है. इस टेस्ट में लगभग 90% फेल हो जाते हैं.
आखिरी टेस्ट जिसे सिर्फ द लॉन्ग वॉक के नाम से जाना जाता है काफी ज्यादा सख्त है. उम्मीदवारों को 45 पाउंड यानी की 20 किलो का रकसैक लेकर 40 मील का मार्च पूरा करना होता है.
जो लोग सिलेक्शन पास कर लेते हैं वह ऑपरेटर ट्रेनिंग कोर्स में जाते हैं. यह 6 महीने का एक ट्रांसफॉर्मेशन है जो आतंकवाद विरोधी और गुप्त युद्ध पर केंद्रित होता है. ट्रेनिंग में क्लोज क्वार्टर कॉम्बैट, एडवांस्ड निशानेबाजी, निगरानी, तोड़फोड़ और जासूसी के गुर शामिल हैं.
भारत में जिस यूनिट की तुलना अक्सर डेल्टा फोर्स से की जाती है वह है स्पेशल ग्रुप. रिसर्च एंड एनालिसिस विंग के तहत काम करने वाला स्पेशल ग्रुप एक टियर-1 फोर्स है जो आतंकवाद विरोधी और बंधक बचाव में माहिर है.
भारत में कई अन्य टॉप टियर यूनिट्स हैं जिनकी क्षमताएं मिलती-जुलती हैं. पैरा स्पेशल फोर्सज अपनी कड़ी 90 दिन की प्रोबेशन के लिए जानी जाती है. नेशनल सिक्योरिटी गार्ड शहरी आतंकवाद विरोधी और बंधक बचाव पर ध्यान देता है जबकि मार्कोस समुद्री अभियानों में माहिर है.