सबसे पहले यहां होती है नए साल की पहली दस्तक, जहां दुनिया से पहले बदलता है वक्त का कैलेंडर
दुनिया में सबसे पहले नए साल का आगमन किरिबाती देश के किरितिमाती द्वीप पर होता है, जिसे क्रिसमस आइलैंड भी कहा जाता है. यह द्वीप प्रशांत महासागर में स्थित है और इंटरनेशनल डेट लाइन के सबसे आगे वाले समय क्षेत्र में आता है.
यही वजह है कि जब दुनिया के ज्यादातर हिस्से अभी 31 दिसंबर में होते हैं, तब किरितिमाती में 1 जनवरी की सुबह शुरू हो चुकी होती है. आम धारणा यह है कि न्यूजीलैंड या ऑस्ट्रेलिया सबसे पहले नया साल मनाते हैं, लेकिन यह पूरी तरह सही नहीं है.
न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया किरितिमाती के बाद नए साल में प्रवेश करते हैं. किरितिमाती इंटरनेशनल डेट लाइन के पूर्वी छोर पर स्थित है, इसलिए घड़ी और तारीख यहां सबसे पहले बदलती है. इसी कारण इसे दुनिया का पहला नया साल मनाने वाला स्थान माना जाता है.
इंटरनेशनल डेट लाइन पृथ्वी पर वह काल्पनिक रेखा है, जहां तारीख बदलती है. किरिबाती ने अपने समय क्षेत्र में बदलाव कर अपने कुछ द्वीपों को इस रेखा के आगे कर लिया था. इसका उद्देश्य प्रशासनिक सुविधा के साथ-साथ राष्ट्रीय एकता बनाए रखना था. इसी फैसले ने किरितिमाती को यह खास पहचान दिलाई कि वह दुनिया में सबसे पहले नए साल का स्वागत करता है.
किरिबाती एक छोटा सा द्वीपीय देश है, जो प्रशांत महासागर में फैला हुआ है. इसमें कुल 33 द्वीप और एटॉल शामिल हैं. किरितिमाती इसका सबसे बड़ा द्वीप है और इसे दुनिया के सबसे बड़े कोरल द्वीपों में गिना जाता है. भूमि क्षेत्र के लिहाज से यह अनोखा द्वीप है, लेकिन आबादी बेहद कम है और यहां जीवन बेहद सादा है.
किरितिमाती और किरिबाती के अन्य द्वीपों पर रहने वाले लोग मुख्य रूप से माइक्रोनेशियाई संस्कृति से जुड़े हैं. उनकी जिंदगी समुद्र के इर्द-गिर्द घूमती है. मछली पकड़ना, नारियल और सीमित खेती यहां के लोगों की आजीविका का मुख्य साधन है. संसाधनों की कमी, स्वच्छ पानी और रोजगार यहां की बड़ी चुनौतियां हैं, फिर भी लोग अपनी संस्कृति और सामूहिक जीवन से जुड़े रहते हैं.
कठिन परिस्थितियों के बावजूद किरितिमाती के लोगों को एक बात का खास गर्व है. जब दुनिया का बड़ा हिस्सा अभी नींद में होता है, तब वे सूरज की पहली किरणों के साथ नए साल का स्वागत करते हैं. समुद्र किनारे छोटी सभाएं, पारंपरिक गीत-संगीत और सामूहिक प्रार्थनाएं यहां नए साल के जश्न का हिस्सा होती हैं. उनके लिए यह सिर्फ उत्सव नहीं, बल्कि अपनी विशिष्ट पहचान का प्रतीक है.