इस देश में 'बच्चे पैदा करने की मशीन' बना दी गई थीं महिलाएं, अबॉर्शन पर मिलती थी सजा

सोचिए एक ऐसा देश, जहां किसी महिला से यह पूछने का भी हक नहीं था कि वह मां बनना चाहती है या नहीं. जहां गर्भ ठहरते ही उसका शरीर सरकार की संपत्ति मान लिया जाता था. जहां अस्पताल नहीं, पुलिस तय करती थी कि महिला अपराधी है या नहीं. एक ऐसा दौर, जब बच्चा पैदा करना देशभक्ति माना जाता था और अबॉर्शन मौत या जेल का रास्ता होती थी. यह कहानी है उस देश की, जहां डर ने मां बनने को मजबूरी बना दिया था.
यह डरावनी हकीकत रोमानिया की है. साल 1966 में वहां के तानाशाह शासक निकोलाए चाउशेस्कु ने एक कानून लागू किया, जिसे डिक्री 770 कहा गया. इस कानून का मकसद साफ था- देश की आबादी को तेजी से बढ़ाना. सरकार को लगता था कि ज्यादा जनसंख्या से रोमानिया ताकतवर बनेगा, लेकिन इसके लिए महिलाओं की आजादी की कुर्बानी दे दी गई.
डिक्री 770 के तहत अबॉर्शन को लगभग पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया गया. केवल कुछ खास हालात में ही गर्भपात की अनुमति थी, जैसे महिला की जान खतरे में हो या वह पहले से कई बच्चों की मां हो. इसके अलावा अबॉर्शन कराने वाली महिला और डॉक्टर दोनों को जेल की सजा दी जाती थी. गर्भनिरोधक साधनों पर भी कड़ी रोक लगा दी गई.
इस कानून के बाद महिलाओं की जिंदगी पूरी तरह बदल गई. फैक्ट्रियों और दफ्तरों में काम करने वाली महिलाओं की नियमित मेडिकल जांच कराई जाती थी ताकि यह पता चल सके कि वह गर्भवती हैं या नहीं. शादीशुदा लेकिन निःसंतान महिलाओं से ज्यादा टैक्स वसूला जाता था. महिलाओं का शरीर निजी नहीं, बल्कि सरकारी नियंत्रण में चला गया था.
जब कानून सख्त हुआ, तो जरूरतें खत्म नहीं हुईं. हजारों महिलाओं ने चोरी-छिपे अवैध और असुरक्षित अबॉर्शन कराए. नतीजा यह हुआ कि रोमानिया में मातृ मृत्यु दर तेजी से बढ़ गई. कई महिलाएं संक्रमण, खून बहने और गलत तरीकों से अपनी जान गंवा बैठीं. यह दौर महिलाओं के लिए खामोश त्रासदी बन गया.
जिन महिलाओं ने बच्चे पैदा किए, उनमें से कई उन्हें पालने में असमर्थ थीं. नतीजतन देश के अनाथालय हजारों अनचाहे बच्चों से भर गए. इन बच्चों को पर्याप्त खाना, इलाज और प्यार नहीं मिल पाया. कई बच्चे कुपोषण, बीमारियों और मानसिक समस्याओं का शिकार हो गए. आबादी बढ़ी जरूर, लेकिन इंसानी हालात बदतर हो गए.
साल 1989 में रोमानिया में बड़ा राजनीतिक बदलाव हुआ. जनता के गुस्से और विद्रोह के बाद चाउशेस्कु की सत्ता खत्म हुई और उन्हें फांसी दे दी गई. इसके साथ ही डिक्री 770 को भी रद्द कर दिया गया. अबॉर्शन को फिर से कानूनी मान्यता मिली और महिलाओं को अपने शरीर पर फैसला लेने का अधिकार वापस मिला.
आज रोमानिया उस दौर को अपने इतिहास का सबसे काला अध्याय मानता है. यह कहानी बताती है कि जब राज्य इंसान के निजी फैसलों में जबरदस्ती दखल देता है, तो नतीजा विकास नहीं, बल्कि तबाही होता है.