कैसे तय होती है फाइटर जेट की पीढ़ी, किस तरह के बदलाव से आता है अंतर?
फाइटर जेट की पीढ़ी कोई आधिकारिक कानूनी श्रेणी नहीं है, बल्कि यह रक्षा विशेषज्ञों द्वारा इस्तेमाल किया जाने वाला तकनीकी वर्गीकरण है. इससे यह समझा जाता है कि किसी विमान में कितनी बड़ी तकनीकी छलांग आई है.
इस वर्गीकरण में रडार तकनीक, हथियारों की क्षमता, इंजन की ताकत, एवियोनिक्स सिस्टम, स्टील्थ डिजाइन और डिजिटल सिस्टम जैसी चीजें अहम भूमिका निभाती हैं. जब इन क्षेत्रों में बड़ा बदलाव आता है, तब नई पीढ़ी मानी जाती है.
1940 और 50 के दशक में पहली पीढ़ी के जेट सामने आए. ये विमान सबसोनिक गति से उड़ते थे और मुख्य रूप से गन व साधारण बमों पर निर्भर थे. उदाहरण के तौर पर MiG-15 को शुरुआती जेट लड़ाकू विमानों में गिना जाता है.
दूसरी पीढ़ी में सुपरसोनिक गति और शुरुआती रडार सिस्टम शामिल हुए. हवा से हवा में मार करने वाली मिसाइलें भी इसी दौर में आईं. MiG-21 इसका प्रमुख उदाहरण है. 1960 और 70 के दशक में तीसरी पीढ़ी के जेट आए. इनमें मल्टी-रोल क्षमता विकसित हुई, यानी एक ही विमान हमला और रक्षा दोनों कर सकता था. बियॉन्ड विजुअल रेंज मिसाइलों का इस्तेमाल शुरू हुआ. Mirage 2000 इसी श्रेणी में आता है.
चौथी पीढ़ी में बड़ा बदलाव डिजिटल फ्लाइट कंट्रोल सिस्टम यानी फ्लाई-बाय-वायर के रूप में आया. इससे विमान ज्यादा चुस्त और सुरक्षित हुए. F-16 Fighting Falcon और Sukhoi Su-27 जैसे विमान इस दौर की पहचान बने. 90 के दशक के बाद 4.5 पीढ़ी सामने आई. इसमें चौथी पीढ़ी की मूल क्षमताओं के साथ एडवांस रडार, खासकर AESA रडार, बेहतर मिसाइल सिस्टम और सीमित स्टील्थ तकनीक जोड़ी गई.
Dassault Rafale और Sukhoi Su-30MKI जैसे विमान इस श्रेणी में गिने जाते हैं. ये पूरी तरह स्टील्थ नहीं होते, लेकिन आधुनिक युद्ध की जरूरतों के हिसाब से बेहद सक्षम हैं. 2000 के बाद पांचवीं पीढ़ी के फाइटर जेट सामने आए. इनकी सबसे बड़ी खासियत स्टील्थ तकनीक है, यानी रडार से बचने की क्षमता.
इन विमानों में हथियार अंदरूनी खानों में रखे जाते हैं ताकि रडार सिग्नल कम से कम परावर्तित हो. F-22 Raptor और F-35 Lightning II इसके उदाहरण हैं. रूस का Sukhoi Su-57 भी इसी श्रेणी में आता है. पांचवीं पीढ़ी में सेंसर फ्यूजन तकनीक बेहद अहम है. इसका मतलब है कि विमान के अलग-अलग सेंसर से आने वाला डेटा एक साथ जुड़कर पायलट को रियल टाइम में पूरी तस्वीर दिखाता है. सुपरक्रूज क्षमता यानी बिना आफ्टरबर्नर के सुपरसोनिक उड़ान भी इसी श्रेणी की पहचान है.
अब दुनिया की बड़ी ताकतें छठी पीढ़ी के जेट पर काम कर रही हैं. अमेरिका, यूरोप और एशिया के कई देश इस दिशा में निवेश बढ़ा रहे हैं. हाल के वर्षों में अमेरिकी नेतृत्व ने अपने भविष्य के प्रोजेक्ट, जिसे F-47 के नाम से संदर्भित किया गया, को बेहद उन्नत बताया है. छठी पीढ़ी में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की बड़ी भूमिका होगी. विमान खुद निर्णय लेने में पायलट की मदद करेगा. कुछ प्रोजेक्ट्स में ऑप्शनल मैनिंग यानी पायलट के बिना उड़ान भरने की क्षमता पर भी काम चल रहा है.
हर नई पीढ़ी में अंतर सिर्फ स्पीड से नहीं आता. असली बदलाव तकनीक के एकीकरण में होता है. स्टील्थ डिजाइन, उन्नत रडार, डिजिटल कंट्रोल सिस्टम, नेटवर्क आधारित युद्ध प्रणाली और अब एआई ये सभी मिलकर नई पीढ़ी को परिभाषित करते हैं.
आज का युद्ध सिर्फ हवा में लड़ाई नहीं है, बल्कि डेटा, सेंसर और नेटवर्क का खेल है. यही कारण है कि फाइटर जेट की पीढ़ी तकनीकी छलांग को दिखाती है, न कि सिर्फ उसकी रफ्तार को.