कचरे से कैसे बनती है बिजली, इस पर कितना आता है खर्च?

Waste To Energy: जैसे-जैसे शहर कचरे के बढ़ते ढेर से जूझ रहे हैं, वेस्ट टू एनर्जी टेक्नोलॉजी एक साथ दो समस्याओं को हल करने के तरीके के रूप में उभर रही है. पहला कचरे का निपटान और दूसरा बिजली उत्पादन. इसी बीच आइए जानते हैं कि कचरे से कैसे बिजली बनाई जाती है और इस पर कितना खर्च आता है.
वेस्ट टू एनर्जी एक ऐसी टेक्नोलॉजी है जो म्युनिसिपल और ऑर्गेनिक कचरे को इस्तेमाल लायक ऊर्जा में बदलती है. इसके दो मुख्य तरीके हैं. थर्मल प्रोसेसिंग, जिसमें गर्मी और बिजली पैदा करने के लिए कचरे को जलाया जाता है और बायो-मेथेनेशन जिसमें गीले कचरे को सड़ाकर मीथेन युक्त बायोगैस बनाई जाती है.
थर्मल प्लांट में इकट्ठा किए गए कचरे को पहले सूखने दिया जाता है और उसके बाद लगभग 850 डिग्री सेल्सियस या फिर उससे ज्यादा के तापमान पर एक खास भट्टी में जलाया जाता है. इससे पैदा होने वाली गर्मी पानी को उबलती है और हाई प्रेशर बाप बनाती है. यह भाप जनरेटर से जुड़ी टरबाइन को घूमाकर बिजली पैदा करती है.
जलने से कचरा पूरी तरह से खत्म नहीं होता. इस प्रक्रिया के बाद राख बचती है. इससे धातुएं निकाली जा सकती हैं. इसकी बनावट और लागू मानकों के आधार पर बची हुई सामग्री का इस्तेमाल सीमेंट या फिर ईट जैसे उत्पादों में किया जा सकता है. भट्टी से निकलने वाली गैस भी बाहर छोड़े जाने से पहले प्रदूषण कंट्रोल सिस्टम से गुजरती है.
बायो मेथेनेशन खासतौर पर गीले कचरे, जैसे खाने की बची हुई चीजों और सब्जी मंडी के कचरे के लिए उपयुक्त है. बैक्टीरिया ऑक्सीजन रहित डाइजेस्टर के अंदर सामग्री को तोड़ते हैं, जिसमें मीथेन वाली बायोगैस बनती है. शुद्धिकरण के बाद यह गैस जनरेटर चला सकती है और बचा हुआ गाढ़ा पदार्थ ऑर्गेनिक खाद के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है.
निवेश काफी हद तक टेक्नोलॉजी, क्षमता और प्रदूषण कंट्रोल की जरूरत पर निर्भर करता है. मोटे तौर पर 1 मेगावाट का प्लांट लगाने में लगभग 15 करोड़ से 25 करोड़ का खर्चा आ सकता है.
इसका एक बड़ा उदाहरण बिहार के पटना में बन रहा प्रोजेक्ट है. 15 मेगावाट के इस प्लांट की अनुमानित लागत लगभग 514 करोड़ है और इसे हर दिन लगभग 1400 टन कचरे को प्रोसेस करने के लिए डिजाइन किया गया है.
थर्मल प्लांट की तुलना में छोटे बायो मेथेनेशन सुविधा के लिए काफी कम निवेश की जरूरत होती है. रोजाना लगभग 10 से 20 टन गीले कचरे को प्रोसेस करने वाली सुविधा की लागत कुछ लाख रुपये से लेकर लगभग 2 से 5 करोड़ तक हो सकती है.
लैंडफिल में भेजे जाने वाले कचरे की मात्रा कम की जा सकती है और साथ ही बिजली या फिर बायोगैस भी बनाई जा सकती है. हालांकि की सफलता कचरे को सही ढंग से अलग करने, कुशल टेक्नोलॉजी, कचरे की लगातार सप्लाई और प्रदूषण पर कड़े नियंत्रण पर निर्भर करती है.