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ब्रिटिश हुकूमत में दिल्ली में किस तरह मनाई जाती थी होली, जानें कितने सख्त थे नियम?

निधि पाल   |  27 Feb 2026 10:08 AM (IST)
ब्रिटिश हुकूमत में दिल्ली में किस तरह मनाई जाती थी होली, जानें कितने सख्त थे नियम?

भारत में होली सिर्फ रंगों का त्योहार नहीं, बल्कि रिश्तों को नया रंग देने का दिन है. फागुन की हवा के साथ जब ढोल की थाप और अबीर-गुलाल उड़ता है, तो गांव से लेकर शहर तक माहौल बदल जाता है. इस बार होली 2 और 4 मार्च को मनाई जाएगी, लेकिन मुगल शासन के अंतिम दौर और ब्रिटिश हुकूमत के फैलते प्रभाव के समय भी यह त्योहार सामाजिक जीवन का हिस्सा बना रहा. इसी दौर में दिल्ली में ईस्ट इंडिया कंपनी के बड़े अफसर Sir Thomas Metcalfe का नाम सामने आता है, जिनके बारे में कहा जाता है कि वे होली के अवसर पर स्थानीय लोगों के साथ रंग खेलते थे. चलिए जानें.

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बीबीसी की रिपोर्ट बताती है कि सर थॉमस मेटकाफ दिल्ली में कंपनी सरकार के उच्च अधिकारी थे. वे मुगल दरबार में ईस्ट इंडिया कंपनी के प्रतिनिधि के रूप में तैनात थे. उनका संबंध ब्रिटेन के एक प्रभावशाली परिवार से था.

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उस समय दिल्ली राजनीतिक और सांस्कृतिक रूप से अहम शहर था. मुगल सत्ता कमजोर हो रही थी और ब्रिटिश प्रभाव बढ़ रहा था. ऐसे माहौल में स्थानीय समाज से संबंध बनाए रखना प्रशासनिक दृष्टि से भी महत्वपूर्ण माना जाता था.

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कई पुराने विवरणों के अनुसार, मेटकाफ होली के दिन अपने निवास पर कार्यक्रम रखते थे. हालांकि इस बात के औपचारिक सरकारी दस्तावेज सीमित हैं, लेकिन उस समय सिविल लाइंस में रहने वाली मिसेज एवरेट के संस्मरणों में इसका उल्लेख मिलता है.

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इन संस्मरणों में कहा गया है कि मेटकाफ को रंगों के त्योहार से परहेज नहीं था, लेकिन उन्होंने यह नियम बना रखा था कि उनके घर के अंदरूनी हिस्से में रंग न डाला जाए, क्योंकि वहां पर हवेली में उनके हीरो नेपोलियन के पुतले लगे थे और वे नहीं चाहते थे कि उन पर एक भी बूंद रंग जाए.

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दिल्ली के उत्तरी हिस्से में स्थित उनका निवास Metcalfe House स्थानीय लोगों में मटका कोठी के नाम से जाना जाता था. यहां राजाओं, नवाबों, जमींदारों और सेठों का आना-जाना रहता था.

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होली के मौके पर चांदनी चौक और आसपास के इलाकों के रईस लाल गुलाल लेकर उनके यहां पहुंचते थे. बताया जाता है कि उस दिन मेटकाफ खास तौर पर कुर्ता-पायजामा पहनते थे और मेहमानों से मिलते थे.

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बीबीसी की मानें तो होली खेलने के बाद वे अपने पहने हुए कपड़े अपने हिंदू नौकरों को दे देते थे. नौकर इन कपड़ों को स्वीकार कर लेते थे और लंबे समय तक पहनते थे. यह व्यवहार उस समय के सामाजिक संबंधों को दिखाता है, जहां प्रशासनिक अधिकारी स्थानीय परंपराओं में भाग लेकर अपने संबंध मजबूत करते थे.

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साल 1857 की बगावत के दौरान दिल्ली में बड़े पैमाने पर हिंसा और लूटपाट हुई. इसी दौरान मेटकाफ हाउस को भी नुकसान पहुंचा. ऐतिहासिक विवरणों में उल्लेख है कि विद्रोह के समय यह संपत्ति लूटी गई और काफी हद तक नष्ट हो गई. इसके बाद दिल्ली की सामाजिक और राजनीतिक स्थिति पूरी तरह बदल गई. अंग्रेजी शासन ने सीधे नियंत्रण की नीति अपनाई और स्थानीय संबंधों की प्रकृति भी बदल गई.

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दिल्ली के अलावा आगरा में भी अंग्रेज अधिकारियों द्वारा होली और दीवाली जैसे त्योहारों में भाग लेने का उल्लेख मिलता है. आगरा स्थित हैलिंगर हॉल में अंग्रेज अधिकारी और स्थानीय व्यापारी एक साथ कार्यक्रमों में शामिल होते थे.

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यह भवन Sir Charles Metcalfe से जुड़े परिवार की शैली में बनाया गया था. उस दौर में यहां सामाजिक समारोह, नृत्य और मेल-मिलाप के कार्यक्रम होते थे.

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