कब और कैसे बनी दुनिया की पहली सबमरीन, कैसे होता था संचालन?

समंदर की गहराइयों में पनडुब्बी महीनों तक गुप्त रूप से दुश्मन की तलाश करती हैं, तो इंसानी समझ दंग रह जाती है, लेकिन क्या आपने कभी सोचा है कि इसे दुनिया में सबसे पहले किसने बनाया और यह कितने गहरे पानी में चलती थी और इसका संचालन कैसे होता था, चलिए आज इस रिपोर्ट में जानें.
दुनिया की पहली सबमरीन बनाने का श्रेय नीदरलैंड के प्रसिद्ध आविष्कारक कॉर्नेलिस ड्रेबेल को दिया जाता है. उन्होंने इसे 1620 में इंग्लैड की धरती पर बनाया था. बिना किसी आधुनिक मशीनों के और बिना किसी सीमित संसाधनों के साथ तैयार पनडुब्बी का परीक्षण लंदन की मशहूर थेम्स नदी में किया गया था.
इस खास मशीन और हैरान कर देने वाले नजारे को देखने के लिए खुद राजा जेम्स प्रथम भी वहां पर मौजूद थे. पानी के अंदर चलने वाली इस अनूठी संरचना ने उस दौर के तमाम वैज्ञानिकों और आम लोगों को पूरी तरह आश्चर्यचकित कर दिया था.
आज के दौर से उस वक्त की सबमरीन बेहद अलग थी. उस पनडुब्बी की आंतरिक और बाहरी संरचना आज की लोहे या स्टील की सबमरीन जैसी नहीं थी. ड्रेबेल ने इसे बनाने के लिए मुख्य रूप से लकड़ी के मजबूत ढांचे का प्रयोग किया था और पूरे ढांचे को वाटरप्रूफ बनाने के लिए उस पर वाटरप्रूफ चमड़ा चढ़ाया गया था.
बाहरी सीन को देखने के लिए उसमें कांच की छोटी-छोटी खिड़कियां लगाई गई थीं और पानी के रिसाव को रोकने के लिए खास सीलिंग का इस्तेमाल किया गया था. वैसे तो यह बनावट बहुत साधारण थी, लेकिन उस जमाने की इंजीनियरिंग के हिसाब से यह बहुत बड़ा आविष्कार था.
वर्तमान समय की पनडुब्बियां भले ही डीजल इंजनों या उन्नत परमाणु रिऐक्टरों की शक्ति से चलती हों, लेकिन 17वीं सदी की इस पहली सबमरीन को चलाने का तरीका पूरी तरह इंसानी ताकत पर निर्भर था.
उस वक्त इसे नाव की तरह से चलाया जाता था. नाव की तरह ही इसे आगे बढ़ाने के लिए अंदर बैठे नाविकों द्वारा लकड़ी के बड़े-बड़े चप्पू चलाए जाते थे. ये चप्पू पनडुब्बी के बाहरी किनारों से जुड़े होते थे, जहां से पानी अंदर न आ पाए इसके लिए चमड़े की खास सील लगाई गई थी.
यह पानी की सतह से केवल 12 से 15 फीट (लगभग 4 से 5 मीटर) की गहराई तक ही नीचे जा सकती थी और कुछ समय तक सुरक्षित पानी के अंदर रुक सकती थी. उस वक्त के हिसाब से यह एक ऐतिहासिक उपलब्धि थी.