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क्या मौत आने से पहले ही इंसान को हो जाता है इसका अंदाजा, जानें 7 दिन पहले क्या होता है?

निधि पाल   |  15 Jun 2026 04:39 PM (IST)
क्या मौत आने से पहले ही इंसान को हो जाता है इसका अंदाजा, जानें 7 दिन पहले क्या होता है?

क्या इंसान को अपनी मौत से पहले कोई संकेत मिलते हैं? क्या शरीर और मन पहले ही यह इशारा देने लगते हैं कि अंत करीब है? सदियों से लोग यह सवाल पूछते आए हैं. कोई इसे विज्ञान से जोड़ता है, तो कोई धार्मिक ग्रंथों में इसका जवाब खोजता है. हैरानी की बात यह है कि आधुनिक मेडिकल साइंस और प्राचीन मान्यताएं, दोनों ही मृत्यु से पहले होने वाले कुछ खास बदलावों की ओर इशारा करती हैं. इन्हीं संकेतों को समझने की कोशिश इस रिपोर्ट में की गई है.

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मेडिकल साइंस के मुताबिक, जब शरीर जीवन के अंतिम चरण में पहुंचता है, तो कई शारीरिक प्रक्रियाएं धीरे-धीरे धीमी पड़ने लगती हैं. डॉक्टरों और पालीएटिव केयर विशेषज्ञों के अनुसार, मौत से कुछ दिन पहले शरीर खुद को ऊर्जा बचाने की स्थिति में ले जाता है.

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मृत्यु के करीब पहुंचते व्यक्ति को अक्सर भूख और प्यास बहुत कम लगने लगती है. पाचन तंत्र सुस्त हो जाता है, जिससे खाना-पानी लेने की इच्छा खत्म होने लगती है. यह एक सामान्य जैविक प्रक्रिया मानी जाती है.

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अंतिम दिनों में सांस कभी बहुत तेज, तो कभी बहुत धीमी हो सकती है. कई बार सांस रुक-रुक कर चलती है, जिसे डॉक्टर चेन-स्टोक्स ब्रीदिंग कहते हैं. गले से घरघराहट जैसी आवाज भी आ सकती है, जिसे आम भाषा में डेथ रैटल कहा जाता है.

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शरीर की ऊर्जा तेजी से घटने लगती है. व्यक्ति दिन का अधिकांश समय सोते हुए बिताता है और जागने पर भी बेहद थका हुआ महसूस करता है. हाथ-पैर उठाने या बोलने में भी दिक्कत आने लगती है.

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मृत्यु से कुछ दिन पहले व्यक्ति के व्यवहार और सोच में भी बदलाव दिख सकते हैं. कई बार वह भ्रम की स्थिति में चला जाता है और ऐसी बातें करने लगता है, जिनका आसपास के माहौल से कोई संबंध नहीं होता है.

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कुछ लोग ऐसी चीजें देखने या सुनने की बात कहते हैं, जो वास्तव में मौजूद नहीं होतीं हैं. मेडिकल साइंस इसे ऑक्सीजन की कमी, दवाओं के असर या दिमागी गतिविधियों में बदलाव से जोड़कर देखता है.

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भारतीय परंपरा में गरुड़ पुराण और शिव पुराण जैसे ग्रंथों में मृत्यु से पहले मिलने वाले संकेतों का वर्णन मिलता है. हालांकि इन्हें आस्था और विश्वास के रूप में देखा जाता है, न कि वैज्ञानिक प्रमाण के तौर पर देखा जाता है.

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विशेषज्ञों का मानना है कि मौत से लगभग एक हफ्ता पहले शरीर और दिमाग दोनों तेजी से काम करना कम कर देते हैं. यही वजह है कि इस दौरान शारीरिक कमजोरी, मानसिक भ्रम और भावनात्मक दूरी एक साथ नजर आती है. यह एक प्राकृतिक प्रक्रिया है, जिसे डर के बजाय समझदारी और संवेदनशीलता से देखने की जरूरत होती है.

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