क्या सच में रोते हैं मगरमच्छ, क्यों इस कठोर जानवर के आंसुओं को कहा जाता है झूठा?

जब कोई दिखावटी दुख जताता है तो लोग कहते हैं- मगरमच्छ के आंसू बहा रहा है, लेकिन क्या सच में मगरमच्छ रोता है? क्या यह खूंखार शिकारी अपने शिकार को खाते वक्त पछतावे में आंसू बहाता है, या फिर इसके पीछे कोई वैज्ञानिक वजह छिपी है? सदियों पुरानी इस कहावत के पीछे का सच जानेंगे तो समझ आएगा कि प्रकृति का नियम और इंसानी सोच कितनी अलग होती है.
क्या मगरमच्छ रोता है? इसका सीधा जवाब है- नहीं. मगरमच्छ इंसानों की तरह भावनाओं के कारण नहीं रोते हैं. वे न दुख में आंसू बहाते हैं और न ही खुशी में. कई बार लोगों ने देखा कि मगरमच्छ जब शिकार खा रहा होता है या लंबे समय तक मुंह खोलकर बैठा रहता है, तब उसकी आंखों से पानी निकलता है.
यही सीन देखकर यह धारणा बनी कि वह अपने शिकार पर दया दिखा रहा है, लेकिन असल में ऐसा नहीं है. मगरमच्छ की आंखों में खास तरह की ग्रंथियां होती हैं. इन ग्रंथियों का काम आंखों को नम और साफ रखना है. ये ग्रंथियां समय-समय पर तरल पदार्थ बनाती हैं, ताकि आंखों में धूल या गंदगी न जमे.
जब मगरमच्छ अपने जबड़े को जोर से बंद करता है, शिकार को चबाता है या काफी देर तक मुंह खोलकर बैठा रहता है, तब इन ग्रंथियों पर दबाव पड़ता है. दबाव बढ़ने पर आंखों से पानी बाहर निकल आता है.
यह पानी बिल्कुल आंसुओं जैसा दिखता है, लेकिन इसका भावनाओं से कोई लेना-देना नहीं होता. यह सिर्फ एक शारीरिक क्रिया है. मगरमच्छ के आंसू मुहावरे की जड़ें पुराने समय की मान्यताओं में मिलती हैं. यूरोप में मध्यकाल के दौरान यह धारणा फैल गई थी कि मगरमच्छ अपने शिकार को खाते समय रोता है.
लोगों ने जब देखा कि शिकार को निगलते वक्त उसकी आंखों से पानी निकल रहा है, तो उन्होंने इसे पछतावे या झूठे दुख से जोड़ दिया. धीरे-धीरे यह बात कहानी बनकर फैल गई और फिर मुहावरे का रूप ले लिया.
आज यह कहावत उन लोगों के लिए इस्तेमाल होती है जो दिखावे के लिए दुख जताते हैं, जबकि अंदर से उनकी मंशा कुछ और होती है. वैज्ञानिकों के अनुसार मगरमच्छ के आंसू पूरी तरह जैविक प्रक्रिया हैं. कुछ शोधों में यह भी पाया गया है कि जब मगरमच्छ जमीन पर लंबे समय तक रहता है तो उसकी आंखों को सूखने से बचाने के लिए ग्रंथियां सक्रिय हो जाती हैं.
इसके अलावा मगरमच्छ के शरीर में नमक संतुलन बनाए रखने की प्रक्रिया भी होती है, जिससे अतिरिक्त तरल बाहर निकल सकता है. यह प्रक्रिया भावनात्मक नहीं, बल्कि शारीरिक जरूरत है.