विदेशी तिजोरियों में आज भी कैद हैं भारत की ये निशानियां, कब होगी इनकी घर वापसी?

इतिहास के पन्नों को पलटें तो भारत की गुलामी का दौर सिर्फ राजनीतिक शोषण का नहीं, बल्कि हमारी सांस्कृतिक पहचान को लूटे जाने का भी गवाह रहा है. ब्रिटिश हुकूमत और अन्य विदेशी ताकतों ने भारत की सदियों पुरानी, बेशकीमती और अद्वितीय ऐतिहासिक धरोहरों को बेरहमी से लूटा और अपने साथ सात समंदर पार ले गए. हालांकि, बदलते वक्त के साथ आज भारत अपने गौरव को वापस लाने की कानूनी और कूटनीतिक जंग मजबूती से लड़ रहा है. नीदरलैंड द्वारा चोल राजवंश के 11वीं शताब्दी के ऐतिहासिक ताम्रपत्रों को लौटाए जाने के बाद अब दुनिया भर की तिजोरियों में कैद भारत की अन्य बहुमूल्य निशानियों की घर वापसी की मांग ने भारी जोर पकड़ लिया है.
मध्य प्रदेश के ऐतिहासिक भोजशाला मंदिर में स्थापित होने वाली मां वाग्देवी की प्राचीन मूरत इस समय विदेशी धरती पर कैद है. साल 1034 ईस्वी की इस चमत्कारी और कलात्मक मूर्ति को वापस भारत लाने के लिए लंबे समय से कानूनी प्रयास चल रहे हैं. हाल ही में मध्य प्रदेश हाई कोर्ट ने इस मामले में बेहद कड़ा रुख अपनाते हुए सरकार को साफ निर्देश दिए हैं. कोर्ट ने कहा है कि इस ऐतिहासिक और धार्मिक महत्व की मूर्ति को जल्द से जल्द ब्रिटेन से वापस भारत लाकर उसके मूल स्थान पर पूरी श्रद्धा के साथ स्थापित किया जाए.
दुनिया का सबसे मशहूर और विवादित हीरा कोहिनूर जिसे 'माउंटेन ऑफ लाइट' यानी प्रकाश का पर्वत भी कहा जाता है, आज भी ब्रिटेन की महारानी के मुकुट की शोभा बढ़ा रहा है. साल 1849 में पंजाब के विलय के बाद अंग्रेजों ने इसे जबरन अपने कब्जे में ले लिया और आज यह यूनाइटेड किंगडम के टॉवर ऑफ लंदन में कड़े पहरे के बीच रखा हुआ है.
ओडिशा के विश्व प्रसिद्ध कोणार्क सूर्य मंदिर की एक बेहद खूबसूरत और नक्काशीदार सूर्य प्रतिमा वर्तमान में लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की शोभा बढ़ा रही है. हरे क्लोराइट पत्थर को तराशकर बनाई गई यह दिव्य कलाकृति लगभग 1200 ईस्वी के आसपास की मानी जाती है, जिसे राजा नरसिंहदेव प्रथम के शासनकाल में तैयार किया गया था.
मैसूर के सुल्तान टीपू सुल्तान के लिए 18वीं सदी के अंत में बनाई गई एक बेहद अनूठी और यांत्रिक कलाकृति टीपू का टाइगर इस समय लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में बंद है. लकड़ी से बनी यह कलाकृति लगभग एक असली बाघ के आकार की है, जिसमें एक बाघ को ब्रिटिश सैनिक पर हमला करते हुए दिखाया गया है. इस कलाकृति के अंदर एक विशेष यांत्रिक हैंडल लगा हुआ है, जिसे घुमाते ही अंदर का सिस्टम सक्रिय हो जाता है और उसमें से बाघ के गुर्राने तथा ब्रिटिश सैनिक के चीखने की आवाजें साफ सुनाई देती हैं.
बिहार के सुल्तानगंज में साल 1862 में रेलवे निर्माण के लिए की जा रही खुदाई के दौरान तांबे की एक विशाल बुद्ध प्रतिमा मिली थी, जो आज बर्मिंघम म्यूजियम एंड आर्ट गैलरी में रखी है. लगभग साढ़े सात फीट ऊंची और आधे टन से भी ज्यादा वजनी यह प्रतिमा गुप्त और पाल काल के बीच के समय यानी करीब 500 से 700 ईस्वी की मानी जाती है.
सिख साम्राज्य की शाही भव्यता और शानो-शौकत का प्रतीक रहा महाराजा रणजीत सिंह का स्वर्ण सिंहासन आज भारत में नहीं बल्कि लंदन के विक्टोरिया एंड अल्बर्ट म्यूजियम में है. इस आलीशान अष्टकोणीय यानी आठ कोनों वाले सिंहासन को साल 1820 से 1830 के बीच प्रसिद्ध सुनार हाफिज मोहम्मद मुल्तानी ने तैयार किया था.
आंध्र प्रदेश के महान अमरावती स्तूप के चारों ओर सजे 120 बेहद बारीकी से तराशे गए चूना पत्थर के शिलालेखों और मूर्तियों का संग्रह आज लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की कैद में है. ईसा पूर्व पहली सदी से लेकर तीसरी सदी के बीच के माने जाने वाले इन अमरावती मार्बल्स पर बौद्ध धर्म और प्राचीन कालीन भारत की अद्भुत कहानियां उकेरी गई हैं.
मुगल बादशाह शाहजहां के शासनकाल के पहले 10 वर्षों का प्रामाणिक और विस्तृत इतिहास समेटे हुए पदशाहनामा पांडुलिपि आज यूनाइटेड किंगडम की रॉयल लाइब्रेरी, विंडसर कैसल में सुरक्षित है. साल 1639 में तैयार करवाई गई यह ऐतिहासिक हस्तलिखित किताब बेहद सुंदर और सोने के पानी से सजे चित्रों से सुसज्जित है.
उत्तर प्रदेश के प्रयागराज (इलाहाबाद) में एक प्राचीन जल संरचना या टैंक की सफाई और खुदाई के दौरान हरे जेड यानी एक बेहद कीमती पत्थर से बना कछुआ मिला था, जो वर्तमान में ब्रिटिश म्यूजियम का हिस्सा है. 17वीं शताब्दी की शुरुआत में मुगल काल के दौरान एक ही समूचे कीमती पत्थर को तराशकर इस जीवंत कछुए को बनाया गया था.
हिमाचल प्रदेश की खूबसूरत कुल्लू घाटी से प्राप्त हुआ एक प्राचीन और दुर्लभ कांस्य का बर्तन कुल्लू वास भी इस समय लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम की तिजोरी में बंद है. ईसा पूर्व पहली शताब्दी का माना जाने वाला यह बर्तन प्राचीन भारतीय धातु कला का एक नायाब नमूना है. इस वास की सबसे बड़ी खासियत यह है कि इसके चारों तरफ एक शाही जुलूस का बेहद सुंदर और बारीक चित्र उकेरा गया है.
गुजरात में खोजे गए प्रसिद्ध अकोटा खजाने में जैन धर्म से संबंधित बेहद खूबसूरत और प्राचीन कांस्य मूर्तियां मिली थीं, जो 5वीं से 11वीं सदी ईस्वी के बीच की हैं. हालांकि इस ऐतिहासिक खजाने का एक बड़ा और मुख्य हिस्सा आज भी भारत के संग्रहालयों में सुरक्षित है, लेकिन इसकी कुछ सबसे दुर्लभ, महत्वपूर्ण और पश्चिमी भारत की कला शैली को दर्शाने वाली मूर्तियां 20वीं सदी के दौरान तस्करी और अवैध व्यापार के जरिए न्यूयॉर्क के मेट्रोपॉलिटन म्यूजियम ऑफ आर्ट सहित कई अंतरराष्ट्रीय संग्रहालयों तक पहुंच गईं, जिन्हें वापस लाने की मांग चल रही है.