IPS vs CAPF क्या अंतर है, प्रमोशन कैसे होता है और आखिर विवाद क्यों है?
IPS और CAPF दोनों ही देश की सुरक्षा से जुड़े अहम हिस्से हैं, लेकिन इनकी जिम्मेदारियां अलग-अलग होती हैं. IPS अधिकारी मुख्य रूप से कानून-व्यवस्था बनाए रखने और प्रशासनिक फैसले लेने का काम करते हैं, जबकि CAPF की विभिन्न फोर्स जैसे CRPF, BSF और CISF फील्ड में तैनात होकर सुरक्षा और ऑपरेशन संभालती हैं. यही बुनियादी अंतर दोनों को अलग बनाता है.
IPS अधिकारियों के पास ज्यादा प्रशासनिक और कानूनी अधिकार होते हैं. ये जिले में पुलिस प्रमुख के रूप में काम करते हैं और बड़े स्तर पर निर्णय लेते हैं. वहीं CAPF के अधिकारी सीधे जमीन पर तैनात होकर कठिन परिस्थितियों में ड्यूटी निभाते हैं, जहां जोखिम ज्यादा होता है और फैसले तुरंत लेने पड़ते हैं.
दोनों सेवाओं में भर्ती और करियर का रास्ता भी अलग है. IPS अधिकारी UPSC सिविल सेवा परीक्षा के जरिए चुने जाते हैं, जबकि CAPF में सहायक कमांडेंट जैसे पदों के जरिए भर्ती होती है. दोनों में प्रमोशन का सिस्टम है, लेकिन ऊपरी पदों तक पहुंचने का तरीका और मौके अलग-अलग हैं.
विवाद की शुरुआत तब होती है जब CAPF के उच्च पदों पर IPS अधिकारियों की नियुक्ति की जाती है. CAPF अधिकारी मानते हैं कि इन पदों पर उन्हें प्रमोशन मिलना चाहिए, क्योंकि वे लंबे समय से फील्ड में काम कर रहे होते हैं. लेकिन IPS अधिकारियों को इन पदों पर भेजे जाने से उनके अवसर सीमित हो जाते हैं.
अगर पावर और काम की तुलना करें तो IPS अधिकारियों के पास आदेश देने और नीति बनाने की ताकत ज्यादा होती है. वहीं CAPF का काम ज्यादा चुनौतीपूर्ण और जोखिम भरा होता है, क्योंकि उन्हें सीधे ऑपरेशन और सुरक्षा की जिम्मेदारी निभानी पड़ती है. दोनों की भूमिका अलग होते हुए भी बराबर जरूरी है.
विवाद की जड़ यही है कि CAPF अधिकारी चाहते हैं कि उनके कैडर के ऊपरी पदों पर उन्हें ही प्रमोशन मिले, जबकि सरकार अक्सर IPS अधिकारियों को इन पदों पर भेजती है. IPS के पास ज्यादा प्रशासनिक पावर होती है, इसलिए उन्हें नेतृत्व के लिए चुना जाता है. लेकिन CAPF का कहना है कि जो लोग सालों तक ग्राउंड पर काम करते हैं, उन्हें ही शीर्ष पद मिलना चाहिए. यही टकराव इस मुद्दे को बड़ा विवाद बना देता है.