जब 1971 की जंग में भुज की महिलाओं ने दिया देश का साथ

1971 में भारत पाकिस्तान जंग में महिलाओं ने बहादुरी की शानदार मिसाल पेश की. उस जंग में जब पाकिस्तान ने भुज हवाई अड्डे पर बमबारी करके उसे खत्म कर दिया था तो हमारी वायुसेना के लिए इन महिलाओं ने रातोंरात श्रमदान करके नया रनवे बना दिया. सिर के ऊपर से गुजरते हुए पाकिस्तान के लडाकू विमानों के बीच ये काम आसान नहीं था.
एक छोटे से गांव की महिलाओं की ओर से दिखाई गई इस बहादुरी ने भारतीय वायुसेना का दिल जीत लिया. वायुसेना की ओर से गांववालों को खुक्रिया अदा करते हुए खत भेजे गये. केंद्र सरकार की मदद से माधापार गांव के प्रवेश द्वार पर उन बहादुर महिलाओं को याद करते हुए एक स्मारक भी बनाया गया है. उन महिलाओं में से अब सिर्फ 2 ही जिंदा बचीं हैं जो कि अब विदेश में हैं, लेकिन उनकी बहादुरी की कहानी आज भी इस स्मारक के रूप में जिंदा है.
इसी गांव में 69 साल के गोविंद खोखानी उस घटना के गवाह हैं. उन्हें याद है कि किस तरह से आसमान में पाकिस्तानी लडाकू विमानों के खौफ के बीच रनवे के निर्माण का काम हुआ था. शुरूवात में सिर्फ 30 या 40 महिलाओं ने काम शुरू किया और उनसे प्रेरित होकर 300 महिलाएं श्रमदान के लिये निकल पडीं. जब भी पाकिस्तानी विमानों के आने पर चेतावनी देने का सायरन बजता ये महिलाएं आसपास के पेडों और झाडियों में छुप जातीं और विमानों के गुजर जाने के बाद फिरसे से काम शुरू कर देंतीं. देखते ही देखते 72 घंटों के भीतर भुज में नया रनवे बनकर तैयार हो गया
पाकिस्तानी लडाकू विमानों ने 3 दिसंबर 1971 और 17 दिसंबर 1971 के बीच इस इलाके में 92 बम फैंके और 22 रॉकेट दागे. पाकिस्तानी बमबारी से इलाके में भगदड मच गई. लोग पलायन कर देश के दूसरे इलाकों में जाने लगे. भुज के पास माधापुर गांव के लोग भवन निर्माण और मरम्मत के व्यवसाय का व्यवसाय करते थे, लेकिन जंग के हालात में कोई भी अपनी जान जोखिम में नहीं डालना चाहता था. ऐसे में वायुसेना को रनवे फिर से तैयार करने के लिए लोग नहीं मिल रहे थे. रनवे के बीचोंबीच एक 12 फुट का गड्ढा हो गया था, जिसने भरातीय लडाकू विमानों का इसपर से उड़ना नामुमकिन कर था. लेकिन वायुसेना को उस वक्त एक स्टैंडबाय रनवे की सख्त जरूरत थी. ऐसे में रनवे की मरम्मत की जानी जरूरी थी. जब वायुसेना की मदद के लिए कोई आगे नहीं आया तो पास ही के माधापुर गांव की महिलाओं ने ये बीडा अपने सिर लेना शुरू किया. जंग के खौफनाक माहौल में भी वे अपने घरों से बाहर निकलीं और रनवे को तैयार करने का काम शुरू कर दिया.
भारत पाकिस्तान सीमा से सटे कच्छ के भुज में 1965 और 1971 की लडाईयों से जुडी कहानियां चप्पे चप्पे पर मौजूद हैं. ऐसी ही एक कहानी है पास के माधापार गांव की जहां 1971 की जंग में महिलाओं ने बहादुरी की एक मिसाल कायम की थी. गुजरात का भुज हवाई अड्डा अपने आप में एक इतिहास समेटे हुए है. इतिहास 1971 की उस जंग का जिसमें पाकिस्तान के लडाकू विमानों ने इसे बुरी तरह से तबाह कर दिया था. रनवे के टुकडे हो चुके थे. वैसे उस जंग के दौरान भारतीय वायुसेना इस हवाई अड्डे का इस्तेमान न करके पास के जामनगर हवाई अड्डे का इस्तेमाल कर रही थी, लेकिन पाकिस्तानी सीमा से करीब होने के कारण इस हवाई अड्डे को ठीक रखना जरूरी था.