जयंती विशेष: जिस बंदे को पेट भर रोटी नहीं, उसके लिए इज्जत-मर्यादा ढोंग है- तस्वीरों में मुंशी प्रेमचंद के ऐसे महान विचार
प्रेमचंद की कहानियों ने लाखों-करोड़ों लोगों के दिमाग पर अमिट छाप छोड़ी है और आज भी उन्हें भारत के सबसे महत्वपूर्ण लेखक के तौर पर शुमार किया जाता है.
पूस की रात, बड़े घर की बेटी, बड़े भाईसाहब, आत्माराम, शतरंज के खिलाड़ी जैसी कहानियों से प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य की जो सेवा की है, वो अद्भुत है.
अपनी रचना 'गबन' के जरिए से एक समाज की ऊंच-नीच, 'निर्मला' से एक स्त्री को लेकर समाज की रूढ़िवादिता और 'बूढी काकी' के जरिए 'समाज की निर्ममता' को जिस अलग और रोचक अंदाज उन्होंने पेश किया, उसकी तुलना नहीं है.
प्रेमचंद ने हिंदी साहित्य के खजाने को लगभग एक दर्जन उपन्यास और लघु-कथाओं से भरा है. आज मुंशी प्रेमचंद के बिना हिंदी की कल्पना भी करना मुश्किल है.
हिंदी के उपन्यास सम्राट कहे जाने वाले मुंशी प्रेमचंद का जन्म 31 जुलाई 1880 को वाराणसी के लमही गांव में हुआ था. प्रेमचंद के बचपन का नाम धनपत राय श्रीवास्तव था.
प्रेमचंद्र ने लगभग 300 कहानियां और चौदह बड़े उपन्यास लिखे हैं. उनके रचे साहित्य का अनुवाद लगभग सभी प्रमुख भाषाओं में हो चुका है, जिसमें विदेशी भाषाएं भी शामिल हैं.
हिंदी साहित्य में प्रेमचंद का कद काफी ऊंचा है और उनका लेखन कार्य एक ऐसी विरासत है, जिसके बिना हिंदी के विकास को अधूरा ही माना जाएगा. मुंशी प्रेमचंद एक संवेदनशील लेखक, सचेत नागरिक, कुशल वक्ता और बहुत ही सुलझे हुए संपादक थे.