Prashant Kishor: राजनीति के 'रणनीतिकार' अब आश्रम की शरण में! प्रशांत किशोर की 'तपस्या' के पीछे का जानें सच!

आश्रम में प्रशांत किशोर की चुनावी तपस्या
जन सुराज के मुखिया प्रशांत किशोर ने 2031 में होने वाले बिहार विधानसभा चुनाव को लेकर अपनी कमर कस ली है और यह फैसला लिया है कि वे अगले पांच साल तक आश्रम में रहेंगे.
जानकारी के अनुसार, मंगलवार 19 मई को प्रशांत किशोर ने पटना स्थित अपना आवास छोड़ दिया है. इसके बाद वे आईआईटी-पटना के पास स्थित बिहार नवनिर्माण आश्रम में अब आश्रय लेंगे. आश्रम में रहकर वे बिहार चुनाव के लिए रणनीति तैयार करेंगे.
आध्यात्मिक नजरिए से देखें तो आश्रम में शांत और सकारात्मक वातावरण होता है. भारतीय समाज में धर्म और अध्यात्म का गहरा प्रभाव है. साधारण जीवनशैली और आध्यात्मिक छवि कई बार पहचान दिलाने से सहायक हो सकती है.
हालांकि यह पहली बार नहीं है जब भारतीय राजनीति में आध्यात्मिकता से जोड़ा जा रहा है. समय-समय पर नेता मंदिर, मठ और आश्रमों से जुड़ते रहे हैं. खासकर चुनाव से पहले धार्मिक स्थलों पर पहुंचकर देवी-देवताओं और संतों आशीर्वाद लेना आम बात है.
भारतीय संस्कृति में अध्यात्म केवल पूजा-पाठ तक सीमित नहीं, बल्कि यह आत्मचिंतन, संयम और सही निर्णय लेने का मार्ग भी है. शास्त्रों के अनुसार जब व्यक्ति मानसिक तनाव, अस्थिरता या जीवन के बड़े निर्णयों के दौर से गुजरता है, तब वह अध्यात्म की शरण लेकर मन को शांत और स्थिर करने का प्रयास करता है.
धर्मग्रंथों में कहा गया है कि, आश्रम और साधना का वातावरण व्यक्ति को अहंकार, क्रोध और भ्रम से दूर रखता है. भगवद्गीता में भी श्रीकृष्ण ने मन की शांति और आत्मनियंत्रण को सफलता का आधार बताया है. इसलिए आज भी लोग आध्यात्मिक माहौल में समय बिताकर आत्मबल और नई ऊर्जा प्राप्त करने का प्रयास करते हैं.