Mahabharat: कैसे कृपाचार्य और द्रोणाचार्य बने कौरव-पांडवों के गुरु?

महाभारत कथा
एक दिन राजा शांतनु शिकार के लिए वन में गए. वहाँ उन्होंने एक बालक और एक बालिका को देखा. दोनों के पास धनुष-बाण रखे थे और उनके शरीर से तेज झलक रहा था. यह अद्भुत दृश्य देखकर राजा आश्चर्यचकित रह गए और उन बच्चों को अपने साथ हस्तिनापुर ले आए.
राजा शांतनु ने दोनों बच्चों का राजमहल में पुत्र-पुत्री के समान पालन-पोषण कराया. उन्हें उत्तम शिक्षा, सुरक्षा और सभी सुविधाएँ प्रदान की गईं. समय के साथ दोनों बड़े होने लगे. उनकी बुद्धिमत्ता और तेजस्विता देखकर राजपरिवार तथा दरबार के लोग भी प्रभावित होने लगे.
कुछ समय बाद महर्षि शरद्वान हस्तिनापुर पहुँचे. उन्होंने कृप और कृपी को देखकर पहचान लिया कि ये उनके ही पुत्र-पुत्री हैं. उन्होंने राजा शांतनु को पूरी कथा सुनाई और अपने पुत्र कृप को अस्त्र-शस्त्र तथा धनुर्वेद की गूढ़ शिक्षा देना प्रारंभ किया.
महर्षि शरद्वान से शिक्षा प्राप्त करने के बाद कृपाचार्य धनुर्विद्या और शास्त्रों के महान ज्ञाता बन गए. उनकी ख्याति दूर-दूर तक फैल गई. कुरुवंश ने उनकी विद्वता और युद्धकौशल को देखकर उन्हें हस्तिनापुर के राजकुमारों का गुरु नियुक्त कर दिया.
कृपाचार्य के मार्गदर्शन में कौरव और पांडव शिक्षा प्राप्त करने लगे. वे उन्हें शस्त्र संचालन, युद्धकला, नीति और अनुशासन का ज्ञान देते थे. सभी राजकुमार प्रतिदिन अभ्यास करते और अपने गुरु की आज्ञा का पालन करते हुए श्रेष्ठ योद्धा बनने का प्रयास करते थे.
एक दिन शिक्षा के बाद सभी राजकुमार मैदान में गुल्ली-डंडा खेल रहे थे. खेल पूरे उत्साह से चल रहा था. कौरव और पांडव एक-दूसरे से आगे निकलने की कोशिश कर रहे थे. तभी एक जोरदार प्रहार से गुल्ली उड़कर दूर स्थित एक गहरे कुएँ में जा गिरी.
गुल्ली कुएँ में गिरते ही सभी राजकुमार उसके पास पहुँच गए. उन्होंने उसे निकालने के अनेक उपाय किए, लेकिन कुआँ बहुत गहरा था. कोई भी प्रयास सफल नहीं हुआ. धीरे-धीरे सभी राजकुमार निराश हो गए और सोचने लगे कि अब गुल्ली वापस नहीं मिलेगी.
उसी समय वहाँ एक तेजस्वी ब्राह्मण पहुँचे. उन्होंने राजकुमारों की चिंता का कारण पूछा. जब उन्हें पूरी घटना बताई गई तो वे मुस्कुराए. उनके चेहरे पर आत्मविश्वास झलक रहा था. उन्होंने राजकुमारों से कहा कि वे बिना कुएँ में उतरे गुल्ली को बाहर निकाल सकते हैं.
ब्राह्मण ने अपने अद्भुत कौशल का प्रदर्शन किया. उन्होंने तिनकों और बाणों की सहायता से पहले कुएँ से गुल्ली निकाली. फिर अपनी अंगूठी कुएँ में फेंककर उसे भी बाहर निकाल दिया. यह चमत्कारी दृश्य देखकर कौरव और पांडव आश्चर्यचकित रह गए.
राजकुमारों ने हस्तिनापुर जाकर पूरी घटना भीष्म पितामह को सुनाई. वर्णन सुनते ही भीष्म समझ गए कि यह महान धनुर्धर द्रोणाचार्य हैं. उन्होंने द्रोणाचार्य का सम्मानपूर्वक स्वागत किया और उन्हें कुरु राजकुमारों का आचार्य बनाया. इसके बाद द्रोणाचार्य ने कौरवों और पांडवों को उच्च कोटि की शस्त्रविद्या सिखानी शुरू की.