दुल्हन मायके में पीछे और ससुराल में प्रवेश पर आगे क्यों फेंकती है चावल, शास्त्रों में क्या है महत्व

विवाह रस्म
शादी के बाद जब दुल्हन अपने घर वालों से विदा होती है, तो जाते समय वह अपने पीछे चावल डालती है. यह रस्म वर्षों से चली आ रही परंपरा है, विदाई की यह रस्म दुल्हन के लिए भावनाओं से भरी होती है. यह न सिर्फ एक परंपरा है बल्कि उसके नए जीवन की शुरुआत का प्रतीक भी है.
शास्त्रों में चावल शुभता और संपन्नता का प्रतीक है. बेटियां घर की खुशियां होती हैं. ऐसे में विदाई के समय वो चावल पीछे घर में फेंकती है ताकी उनके जान के बाद परिवार खुशहाल बना रहे, कभी अन्न-धन की कमी न हो.
यहां वो चावल अपने सिर से पीछे की ओर घर में फेंकती है. ये माना जाता है कि वो अपने परिवार के लिए सौभाग्य और खुशियों की कामना करती हुई आगे बढ़ रही है. इसे माता पिता के प्रति सम्मान और कृतज्ञता का अंतिम प्रतीक भी माना जाता है.
वहीं नई दुल्हन पहली बार ससुराल में पैरों से चावल का कलश घर में अंदर की ओर डालते हुए प्रवेश करती है.यह रस्म संपन्नता, समृद्धि और लक्ष्मी के आगमन का प्रतीक है.
दुल्हन जब घर में प्रवेश करती है तो कलश में भरे चावल को दाहिने पैरों से गिराती है. माना जाता है कि जिस तरह चावल फैले उसी तरह घर में सुख-समृद्धि फलती फूलती रहे. घर-आंगन में खुशियां फैलती रहें.
चावल के कलश को गिराना सिर्फ एक रस्म नहीं है, बल्कि ये नई दुल्हन को गृहलक्ष्मी के रूप में सम्मान देना भी है. बेटियां घर से जाते वक्त मायके में समृद्धि बनी रही ऐसी कामना करती हैं तो वहीं बहुओं को लक्ष्मी का प्रतीक माना जाता है, उनका ससुराल में इस रस्म को निभाना इस बात का प्रतीक समाझा जाता है कि जिस घर में नई दुल्हन का प्रवेश हो, वहां कभी सुख-समृद्धि खत्म न हो. मां लक्ष्मी की कृपा बनी रहे.