भारत का एक ऐसा शहर जहां मौत को भी उत्सव की तरह मनाते हैं
महादेव की नगरी काशी विश्व की सबसे प्राचीन नगरियों और तीर्थ धामों में से एक है. महादेव की नगरी काशी में मृत्यु मिलना भी किसी वरदान के जैसा ही माना जाता है.
वाराणसी को कालों के काल महादेव शिव की भूमि माना जाता है. यहां पर मृत्यु के बाद शव में रोने की नहीं, ढोल-नगाड़े बजाने की परंपरा है.
काशी ही ऐसी इकलौती नगरी है जहां पर मृत्यु को उत्सव के रूप में मनाया जाता है. कहते हैं जो जीव काशी में प्राण त्यागता है फिर उसे जन्म-मरण के चक्र से मुक्ति मिल जाती है. इसलिए यहां मौत का मातम नहीं उत्सव मनाया जाता है.
मरणं मंगलं यत्र विभूतिश्च विभूषणम्, कौपीनं यत्र कौशेयं सा काशी केन मीयते। - इस श्लोक में काशी के मर्णिकर्णिका घाट की महिमा बताई गई है इसमें लिखा है कि काशी में मृत्यु होना मंगलकारी है. जहां की विभूती आभूषण हो जहां की राख रेशमी वस्त्र की भाति हो वह काशी दिव्य एवं अतुल्निय है.
काशी का सबसे प्रसिद्ध और रहस्यों से भरा घाट मणिकर्णिका है. जिसे महाश्मशान कहा जाता है. कहते हैं कि इसी घाट पर भगवान शिव ने देवी सती के पार्थिव शरीर का अंतिम संस्कार किया था.
काशी में मुमुक्षु भवन है जहां तकरीबन 80 से 100 लोग रहकर मृत्यु का इंतजार करते हैं.