Badrinath Dham Rahasya: कैसे पड़ा बद्रीनाथ नाम ? इस धाम के 5 रहस्य नहीं जानते होंगे आप
बद्रीनाथ को को सृष्टि का आववां बैकुंठ कहा गया है, जहां भगवान विष्णु 6 माह निद्रा में रहते हैं और 6 माह जागते हैं. एक बार विष्णु जी जब ध्यान मुद्रा में लीन थे तो बर्फबारी के कारण वह पूरी तरह बर्फ से ढक गए. मां लक्ष्मी चिंतित हो गईं फिर उन्होंने विष्णु जी के पास एक बेर वृक्ष का रूप ले लिया.
जब श्रीहरि का तप पूरा हुआ तो उन्होंने माता को वृक्ष रूप में बर्फ से ढका पाया. तुमने मेरी रक्षा बद्री वृक्ष के रूप में की है इसलिए आज से मुझे बद्रीनाथ के नाम से जाना जाएगा. इस तरह से भगवान विष्णु का नाम बद्रीनाथ पड़ा.
यहां शीतऋति में मंदिर के कपाट बंद करने से पहले एक अखंड दीप प्रज्वलित किया जाता है. जो अचल ज्ञानज्योति का प्रतीक है. कहते हैं जब कपाट खुलते हैं तब भी ये दीपक ज्यो का त्यो जलता रहता है, जबकि पट बंद होने के बाद मंदिर में कोई नही जाता. ये रहस्य आज भी कायम है.
ब्रदीनाथ धाम नर-नारायण पर्वत के बीच स्थित है. कहा जाता है कि जब ये दो पर्व आपस में मिल जाएंगे तब बद्रीनाथ का मार्ग पूरी तरह से बंद हो जाएगा और भक्त दर्शन नहीं कर पाएंगे. ये धाम लुप्त हो जाएगा. इसके बाद सालों बाद भविष्यबद्री नामक नए तीर्थ का उद्गम होगा.
बद्रीनाथ धाम विष्णु जी का तपस्थल है. एक मान्यता के अनुसार एक बार जब भगवान विष्णु ने यहां तपस्या की थी, तो शंखनाद करने पर उस ध्वनि से देवताओं की साधना भंग हो सकती थी, इसलिए इस स्थान को शांत क्षेत्र माना गया और यहां शंख बजाना वर्जित कर दिया गया. वैज्ञानिक तर्क देखें तो ये पहाड़ी इलाका है यहां शंख बजाने से पहाड़ से बर्फ और पत्थर गिरने की संभावन बढ़ जाता है.
जो जाए बद्री,वो न आए ओदरीयानि जो व्यक्ति बद्रीनाथ के दर्शन कर लेता है उसे माता के गर्भ में दोबारा नहीं आना पड़ता. प्राणी जन्म और मृत्यु के चक्र से छूट जाता है. ऐसी मान्यता है.