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यूरिया नहीं मिला तो किन फसलों को होगा नुकसान, जानें कितनी बढ़ जाएगी लागत?

नीलेश ओझा   |  17 Apr 2026 12:14 PM (IST)
यूरिया नहीं मिला तो किन फसलों को होगा नुकसान, जानें कितनी बढ़ जाएगी लागत?

खेती-किसानी में यूरिया की अहमियत किसी से छिपी नहीं है और अगर ऐन वक्त पर इसकी किल्लत हो जाए, तो किसानों की रातों की नींद उड़ जाती है. खास तौर पर गेहूं, धान और मक्के जैसी फसलों के लिए यूरिया किसी संजीवनी बूटी से कम नहीं है. अगर मिट्टी को जरूरत के हिसाब से नाइट्रोजन नहीं मिला. तो फसलों की ग्रोथ रुक जाती है और पूरी मेहनत पर पानी फिर जाता है.

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गेहूं में कल्ले निकलते समय और धान की रोपाई के शुरुआती हफ्तों में यूरिया की सबसे ज्यादा जरूरत होती है. अगर इस समय खाद नहीं मिली तो पौधों का रंग पीला पड़ने लगता है. बिना पर्याप्त पोषण के फसल कमजोर रह जाती है, जिससे दाने छोटे पैदा होते हैं और कुल उत्पादन में 20 से 30 परसेंट की गिरावट आती है.

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यूरिया की किल्लत होते ही ब्लैक मार्केट का खेल शुरू हो जाता है. जिससे खेती की लागत अचानक आसमान छूने लगती है. सरकारी रेट पर जो बोरी लगभग 266 रुपये की मिलती है. वही ब्लैक में 500 से 800 रुपये तक बिकती है. यानी खाद की मद में ही किसान का खर्च सीधे तौर पर दोगुना से तीन गुना बढ़ जाता है.

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एक औसत किसान प्रति एकड़ करीब तीन बोरी यूरिया डालता है. जिसका सरकारी खर्च 800 रुपये आता है. किल्लत के समय यही खर्च बढ़कर 2400 रुपये तक पहुंच जाता है. इसके साथ ही खाद की तलाश में दूर जाने और लाइनों में लगने के कारण मजदूरी का भी नुकसान होता है. जो प्रति दिन 400-500 रुपये तक पड़ता है.

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सब्जियों की खेती में भी नाइट्रोजन की कमी भारी पड़ती है. जिससे फल का साइज और चमक कम हो जाती है. पालक, गोभी और टमाटर जैसी फसलों में क्वालिटी खराब होने से मंडी में सही भाव नहीं मिलता. लागत बढ़ने और क्वालिटी गिरने का दोहरा नुकसान किसान की पूरी साल भर की मेहनत और जमापूंजी को मिट्टी में मिला देता है.

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जब यूरिया नहीं मिलता तो किसान मजबूरन महंगे लिक्विड फर्टिलाइजर्स या दूसरे सप्लीमेंट्स खरीदते हैं. इन विकल्पों का उपयोग करने से प्रति एकड़ खर्च में 700 से 1000 रुपये का एक्स्ट्रा बोझ बढ़ जाता है. कुल मिलाकर देखें तो खाद न होने की वजह से एक किसान की प्रति एकड़ लागत 2500 से 3500 रुपये तक ऊपर चली जाती है.

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यूरिया का संकट केवल एक फसल को नहीं. बल्कि पूरी ग्रामीण इकोनॉमी को चोट पहुंचाता है. लागत बढ़ने और पैदावार घटने से किसान का मुनाफा कम हो जाता है, जिससे उनकी खरीदारी की क्षमता गिरती है. ऐसे में नैनो यूरिया और जैविक खाद जैसे आधुनिक विकल्पों को अपनाना जरूरी है ताकि लागत पर लगाम कसी जा सके.

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