हर रोग को खत्म कर देती है ये खास दाल, जानिए कैसे करते हैं इसकी खेती
कुल्थी की खेती भारत में जुलाई से अगस्त के बीच होती है. इसकी खेती करने के लिए आपको सबसे पहले अपने खेत की अच्छे जुताई करनी होती है. फिर प्रति हेक्टेयर उसमें 5 टन गोबर का खाद मिलाना होता है. इसके साथ ही इसकी खेती के दौरान इस बात का खास ख्याल रखना होता है कि इनके बीजों में फफूंदनाशक दवा बुआई से पहले जरूर मिला दी जाए.
कुल्थी को अंग्रेजी में हार्स ग्राम कहते हैं. इस दाल का वैज्ञानिक नाम है मैक्रोटिलोमा यूनिफ्लोरम (Macrotyloma uniflorum). आयुर्वेद में इस दाल को एक औषधीय दाल बताया गया है. आपको बता दें दक्षिण भारत में ये दाल एक महत्वपूर्ण फसल है.
कुल्थी के दाल की खेती कर्नाटक, आंध्र प्रदेश, ओडिशा, तमिलनाडु के अलावा छत्तीसगढ़, पश्चिम बंगाल, मध्य प्रदेश, बिहार, उत्तराखंड और हिमाचल प्रदेश में भी होती है. किसानों को इस दाल की खेती कर के अच्छा खासा मुनाफा होता है.
पथरी के लिए कुल्थी का दाल रामबाण माना जाता है. NSBI (नेशनल सेंटर फॉर बायोटेक्नोलॉजी इंफॉर्मेशन) की वेबसाइट पर मौजूद एक रिसर्च के अनुसार, पथरी के इलाज के लिए कुलथी का इस्तेमाल लंबे समय से किया जा रहा है.
डायबिटीज में भी कुल्थी के दाल का खूब इस्तेमाल होता है. कुल्थी को एंटीऑक्सीडेंट गुणों से समृद्ध माना जाता है, जो डायबिटीज के जोखिम को कम करने में मददगार साबित हो सकती है. इसके अलावा वैज्ञानिकों का मानना है कि कुलथी टाइप 2 डायबिटीज पर भी सकारात्मक प्रभाव दिखाती है.
कुल्थी कोलेस्ट्रॉल को भी नियंत्रित करने में सक्षम है. इसलिए जिन लोगों का कोलेस्ट्रॉल बढ़ा रहता है उन्हें कुल्थी की दाल का सेवन करने को कहा जाता है. दरअसल, कुल्थी दाल में हाइपोकोलेस्ट्रोलेमिक यानी कोलेस्ट्रोल पाया जाता है, जो कोलेस्ट्रॉल को कम करने में मददगार साबित होता है.