Sindoor Ki Kheti: मांग में भरने वाला सिंदूर अब किसानों की बढ़ाएगा कमाई, ऐसे करें खेती

Sindoor Ki Kheti: क्या आप जानते हैं कि, शादीशुदा महिलाओं की मांग में भरा जाने वाला सिंदूर अब किसानों के लिए कमाई का एक नया जरिया भी बन सकता है? दरअसल, सिंदूर के पेड़ के बीजों के ऊपर मौजूद लाल रंग से प्राकृतिक सिंदूर तैयार किया जाता है. इतना ही नहीं, इसका इस्तेमाल फूड कलर बनाने में भी होता है. खास बात यह है कि, इस पेड़ की खेती सिर्फ पहाड़ी इलाकों में ही नहीं, बल्कि मैदानी क्षेत्रों में भी की जा सकती है. ऐसे में किसान अपने खेत में सिंदूर का पेड़ लगाकर खेती का एक नया विकल्प अपना सकते हैं.
मैदानी इलाकों में भी कर सकते हैं खेती: सिंदूर के पेड़ की खेती सिर्फ पहाड़ी इलाकों तक ही सीमित नहीं है. किसान इसे मैदानी क्षेत्रों में भी आसानी से लगा सकते हैं. इसके लिए बलुई दोमट मिट्टी को अच्छा माना जाता है. ऐसे में किसान अपने खेत में इस पेड़ को लगाकर कमाई का एक नया रास्ता बना सकते हैं.
लेयरिंग और बीज से तैयार कर सकते हैं पौधे: सिंदूर के पेड़ को लेयरिंग तकनीक से तैयार किया जा सकता है. इसके अलावा किसान इसके बीजों को नर्सरी में उगाकर पौधे तैयार कर सकते हैं. जब पौधे बड़े हो जाएं, तो उन्हें बरसात के मौसम में खेत में लगाया जा सकता है.
तीन साल बाद आने लगते हैं फल: सिंदूर का पेड़ लगाने के तुरंत बाद फल नहीं देता. इसे खेत में लगाने के करीब तीन साल बाद फल आने शुरू होते हैं. आमतौर पर तीसरे से चौथे साल में पेड़ पर फल मिलने लगते हैं. इसलिए इसकी खेती करने वाले किसानों को शुरुआत में थोड़ा इंतजार करना पड़ता है.
एक बार लगाने पर 4 से 5 साल तक मिलते हैं फल: सिंदूर का पेड़ बहुवर्षीय होता है. यानी इसे एक बार लगाने के बाद कई साल तक इससे फल मिल सकते हैं. कृषि वैज्ञानिक के मुताबिक, यह पेड़ करीब 4 से 5 साल तक फल देता है. इससे किसान को बार-बार नए पौधे लगाने की जरूरत नहीं पड़ती.
पौधों के बीच रखें 4 मीटर की दूरी: सिंदूर का पेड़ बड़ा होकर करीब 4 से 5 मीटर तक ऊंचा हो सकता है. इसलिए इसकी खेती करते समय पौधे से पौधे और एक कतार से दूसरी कतार के बीच करीब 4 मीटर की दूरी रखनी चाहिए. किसान चाहें तो पूरे खेत में भी इसकी खेती कर सकते हैं.
बीजों से बनता है प्राकृतिक सिंदूर और फूड कलर: सिंदूर के पेड़ के बीजों के ऊपर लाल रंग की परत होती है. इसी प्राकृतिक रंग का इस्तेमाल सिंदूर बनाने में किया जाता है. इसके अलावा इससे फूड कलर भी तैयार किया जाता है. बाजार में इन उत्पादों की मांग किसानों के लिए कमाई का एक अलग विकल्प बन सकती है.