अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की वैश्विक सक्रियता और आक्रामक दावों के बीच एक बड़ा विश्लेषण सामने आया है. राजनीतिक मामलों के जानकार इयन ब्रेमर का कहना है कि चीन के राष्ट्रपति शी जिनपिंग और भारत के प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी, कई मायनों में ट्रंप से ज्यादा ताकतवर और बेहतर स्थिति में हैं. 

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यह टिप्पणी ऐसे समय पर आई है जब ट्रंप टैरिफ के जरिए अमेरिका के मुनाफे, युद्ध रुकवाने और नोबेल शांति पुरस्कार के दावों को लेकर सुर्खियों में बने हुए हैं.

इयन ब्रेमर ने कही ये बातइंडिया टुडे से बातचीत में इयन ब्रेमर ने कहा कि भले ही अमेरिका दुनिया का सबसे शक्तिशाली देश हो, लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि उसके राष्ट्रपति सबसे ताकतवर नेता हों. उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा,'राष्ट्रपति ट्रंप सबसे ताकतवर नेता नहीं हैं. शी जिनपिंग हैं.' ब्रेमर के मुताबिक इसकी सबसे बड़ी वजह यह है कि शी जिनपिंग को मिडटर्म चुनावों का सामना नहीं करना पड़ता और न ही उनके सामने स्वतंत्र न्यायपालिका जैसी संस्थागत चुनौतियां हैं. उन्होंने कहा कि ट्रंप तीन वर्षों के भीतर पद से बाहर हो सकते हैं, जबकि शी जिनपिंग लंबे समय तक सत्ता में बने रहने की स्थिति में हैं.

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मीडिया की सुर्खियां बनाम असली ताकतब्रेमर ने कहा कि जब ट्रंप मीडिया और सुर्खियों पर फोकस कर रहे होते हैं, तब शी जिनपिंग उनसे कहीं ज्यादा मजबूत स्थिति में रहते हैं. उन्होंने इस सूची में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का नाम भी शामिल किया. ब्रेमर के अनुसार, “मोदी भी ट्रंप से बेहतर स्थिति में हैं.”

मोदी का लंबा कार्यकाल बना ताकतब्रेमर ने कहा कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का लंबा और निरंतर कार्यकाल उन्हें दूरगामी नीतिगत फैसले लेने और उनके दीर्घकालिक लाभ देखने का अवसर देता है. उन्होंने बताया कि ट्रंप या कई यूरोपीय नेताओं के मामले में ऐसा संभव नहीं है, क्योंकि उन्हें लगातार चुनावी दबाव और राजनीतिक अस्थिरता का सामना करना पड़ता है.

उन्होंने कहा, “एक नेता के तौर पर मोदी का लंबे समय तक सत्ता में बने रहना और नीतियों में निरंतरता उन्हें कई यूरोपीय नेताओं के मुकाबले ज्यादा प्रभावी बनाती है. इससे वे अपनी बात मजबूती से रख पाते हैं और अंतरराष्ट्रीय दबावों का बेहतर सामना कर सकते हैं.” ब्रेमर के मुताबिक, हाल के वर्षों में इसके उदाहरण भी देखने को मिले हैं.

अमेरिकी पहल को नहीं मिल रहा व्यापक समर्थनडोनाल्ड ट्रंप ने गुरुवार को हमास और इजराइल के बीच हुए युद्धविराम को बनाए रखने के प्रयासों का नेतृत्व करने के उद्देश्य से अपने प्रस्तावित ‘शांति बोर्ड’ का औपचारिक रूप से अनावरण किया. हालांकि, अमेरिका के कई शीर्ष सहयोगी देशों ने इस पहल से दूरी बनाए रखने का फैसला किया है. रूस ने फिलहाल इस बोर्ड को लेकर विचार करने की बात कही है, जबकि ब्रिटेन ने इसमें शामिल होने से साफ इनकार कर दिया है. इसके अलावा फ्रांस के इनकार के बाद नॉर्वे और स्वीडन ने भी संकेत दिए हैं कि वे इस बोर्ड का हिस्सा नहीं बनेंगे.