इधर BRICS, उधर अमेरिकी हाउस में रूस-ईरान प्रतिबंध बिल पर पड़े वोट, भारत की टेंशन
अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में रूस-ईरान प्रतिबंध बिल पर वोट की तैयारी है. बिल में रूस के व्यापारिक साझेदारों पर भी टैरिफ लगाने का प्रावधान है, जिससे भारत पर असर की चिंता बढ़ी है.

रूस पर नए प्रतिबंध लगाने की दिशा में अमेरिका एक और कदम आगे बढ़ाने की तैयारी में है. अमेरिकी प्रतिनिधि सभा की नियम समिति सोमवार को ‘लिंडसे ओ. ग्राहम रूस और ईरान प्रतिबंध अधिनियम 2026’ पर विचार करेगी. इस बिल में रूस के साथ कारोबार करने वाले देशों पर भी भारी शुल्क लगाने का प्रावधान है. इससे भारत जैसे रूस के प्रमुख व्यापारिक साझेदारों पर भी असर पड़ने की आशंका जताई जा रही है.
यह विधेयक पिछले महीने अमेरिकी सीनेट से भारी बहुमत के साथ पारित हो चुका है. अब इसकी अगली बड़ी परीक्षा प्रतिनिधि सभा में होगी. अगर सदन इसे मंजूरी दे देता है तो राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप को रूस और रूसी तेल-गैस खरीदने वाले देशों के खिलाफ कड़े आर्थिक कदम उठाने के लिए ज्यादा अधिकार मिल सकते हैं. बिल में ईरान पर मौजूदा प्रतिबंधों को और मजबूत करने का भी प्रावधान है.
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भारत समेत रूस के खरीदारों पर बढ़ सकता है दबाव
इस प्रस्ताव का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा रूस के साथ व्यापार करने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाने की व्यवस्था है. इसका मतलब यह है कि अगर कोई देश रूस से तेल, गैस या अन्य सामान खरीदता है, तो अमेरिका उस देश के उत्पादों पर अतिरिक्त शुल्क लगा सकता है. भारत लंबे समय से रूस से बड़ी मात्रा में कच्चा तेल खरीदता रहा है. ऐसे में अगर यह कानून लागू होता है और इसके तहत भारत को निशाना बनाकर शुल्क लगाया जाता है, तो दोनों देशों के व्यापारिक रिश्तों पर दबाव बढ़ सकता है. हालांकि, बिल के अंतिम स्वरूप और इसके लागू होने के तरीके पर आगे की अमेरिकी संसदीय प्रक्रिया अहम होगी.
डेमोक्रेट्स ने बिल पर जताई आपत्ति
प्रतिनिधि सभा में कई डेमोक्रेट सांसद इस विधेयक का विरोध कर रहे हैं. अल्पसंख्यक नेता हकीम जेफ्रीज समेत डेमोक्रेट नेताओं का कहना है कि प्रस्ताव राष्ट्रपति को बहुत व्यापक आर्थिक और शुल्क संबंधी अधिकार दे सकता है. डेमोक्रेटिक सांसद ग्रेगरी मीक्स, डॉन बेयर और रिचर्ड नील ने भी बिल को लेकर चिंता जताई है. उनका तर्क है कि नए शुल्कों का बोझ आखिरकार अमेरिकी उपभोक्ताओं पर पड़ सकता है. उनका यह भी कहना है कि अगर व्यापार और कीमतों पर इसका गलत असर पड़ा तो लंबे समय में यूक्रेन को मिलने वाला अमेरिकी समर्थन भी प्रभावित हो सकता है.
पहले एजेंडे से हटाया गया था बिल
रिपब्लिकन नेतृत्व ने पहले इस विधेयक को सदन के एजेंडे से हटा दिया था. साथ ही मध्यावधि चुनाव से पहले कांग्रेस की छुट्टी जल्दी शुरू करने की योजना भी बनाई गई थी. लेकिन रूस को लेकर बढ़ते दबाव के बीच बिल को अब आपात कदम के तौर पर नियम समिति के सामने फिर से लाया गया है. नियम समिति में विचार के बाद यदि इसे आगे बढ़ाया जाता है तो प्रतिनिधि सभा में मतदान का रास्ता साफ हो सकता है. इसके बाद सदन में बहुमत मिलने पर विधेयक राष्ट्रपति के पास जाएगा.
सीनेटर जीन शाहीन ने फैसले का स्वागत किया
सीनेट की विदेश संबंध समिति की रैंकिंग सदस्य डेमोक्रेट जीन शाहीन ने प्रतिनिधि सभा में बिल पर वोट की संभावना का स्वागत किया है. उन्होंने सोशल मीडिया पोस्ट में कहा कि रूस के खिलाफ कड़े कदम उठाने का समय आ गया है. शाहीन ने रूस के राष्ट्रपति व्लादिमीर पुतिन की युद्ध नीति की आलोचना करते हुए कहा कि यूक्रेन में नागरिकों की मौत हो रही है और प्रस्तावित कानून रूस की अर्थव्यवस्था पर दबाव बढ़ा सकता है. उनके अनुसार अब इस विधेयक को मंजूरी देकर रूस को बातचीत की मेज पर लाने की कोशिश की जानी चाहिए.
बिल पास हुआ तो भारत पर क्या होगा असर?
भारत के लिए इस बिल का सबसे बड़ा सवाल रूस से होने वाला ऊर्जा व्यापार है. भारत अपनी ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने के लिए रूस से कच्चा तेल खरीदता है. यदि अमेरिकी कानून के तहत रूसी तेल खरीदने वाले देशों पर अतिरिक्त शुल्क लगाया जाता है, तो भारत के निर्यातकों पर इसका असर पड़ सकता है.
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