ईरान पर जारी अमेरिकी-इजरायली हमलों के चलते चीन को होने वाली तेल सप्लाई को खतरा पैदा हो गया है. ऐसे में तेहरान और बीजिंग के गहरे ऊर्जा संबंध इस वक्त कई सालों के सबसे कठिन दौर से गुजर रहे हैं. इसे चीनी अर्थव्यवस्था के लिए बड़ा खतरा माना जा रहा है.  तेहरान पर हमलों की बीजिंग ने कड़ी निंदा की है और युद्धविराम का आह्वान किया है, लेकिन चीन ने किसी भी आर्थिक जवाबी कार्रवाई से परहेज किया है, क्योंकि इससे चीन की एनर्जी सप्लाई चेन को ही खतरा हो सकता है.

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'चीन ने ईरानी तेल खरीद कम की'NDTV की रिपोर्ट के मुताबिक, बीजिंग ईरान के तेल निर्यात का 80 प्रतिशत से अधिक खरीदता है. 2025 में यह लगभग 1.38 मिलियन बैरल प्रति दिन के बराबर था, जो चीन के कुल समुद्री कच्चे तेल आयात का लगभग 13 से 14 प्रतिशत था. यह जोखिम काफी बड़ा है. हालांकि ईरान एकमात्र देश नहीं है. चीन के दो सबसे बड़े तेल आपूर्तिकर्ता रूस और सऊदी अरब हैं. तनाव बढ़ने के बाद से चीनी रिफाइनरी कंपनियों ने चुपचाप ईरानी तेल की खरीद कम कर दी है और तेल सप्लाई को स्थिर रखने के लिए रियायती दरों पर मिलने वाले रूसी तेल पर अधिक निर्भर हो गई हैं.

एवेलॉन इंटेलिजेंस के सह-संस्थापक बालाकृष्णन ने तेहरान की जवाबी कार्रवाई को ऐतिहासिक रणनीतिक भूल बताया. उनके अनुसार ईरान केवल एक शक्तिशाली सैन्य गठबंधन का सामना नहीं कर रहा है, बल्कि वह वेस्ट एशिया में चीन की ऊर्जा और जियोपॉलिटिकल आर्किटेक्चर में एक महत्वपूर्ण कड़ी के रूप में अपनी अहम भूमिका को खतरे में डाल रहा है.

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'25 साल का सहयोग समझौता खतरे में'ईरान का बीजिंग के साथ 25 साल का सहयोग समझौता है, जिसमें बेल्ट एंड रोड पहल से जुड़े ऊर्जा, बुनियादी ढांचे और परिवहन गलियारे शामिल हैं. पश्चिमी प्रतिबंधों के बीच अक्सर जटिल बिजनेस चैनलों के जरिए भेजे जाने वाले कच्चे तेल की रियायती खेप ने चीन को आपूर्ति का एक स्थिर आधार दिया है. बालाकृष्णन का तर्क है कि मिडिल ईस्ट में अमेरिकी संपत्तियों पर ईरान के मिसाइल हमले रणनीतिक रूप से उलटे पड़ सकते हैं. 

'अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाना बड़ी गलती'उन्होंने कहा, "अरब धरती पर अमेरिकी संपत्तियों को निशाना बनाकर तेहरान ने तटस्थ पक्षों को नाराज़ कर दिया है और अमेरिका-इजराइल गठबंधन की ओर क्षेत्रीय झुकाव को तेज कर दिया है." इस बदलाव से ईरान का राजनयिक दायरा सीमित हो जाता है और पूरे क्षेत्र में चीन के संतुलन बनाने के प्रयास में मुश्किलें बढ़ जाती हैं.

बीजिंग के लिए सबसे बड़ा खतरा स्ट्रेट ऑफ होर्मुज (होर्मुज जलडमरूमध्य) है. चीन के तेल आयात का लगभग 44 प्रतिशत हिस्सा मिडिल ईस्ट से आता है. इस महत्वपूर्ण समुद्री मार्ग में किसी भी प्रकार की रुकावट चीन से होने वाले इंपोर्ट में ईरान की प्रत्यक्ष हिस्सेदारी से कहीं गुना ज्यादा होगी.

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