'ऑपरेशन एपिक फ्यूरी' कह लें या 'ऑपरेशन रोरिंग लायन'... 40 दिन चले अमेरिका-इजरायल और ईरान जंग में तबाही तीनों तरफ हुई. मिडिल ईस्ट के कई देश इस आग में झोंके गए. हजारों मौतें और सैंकड़ों लोग बेघर हुए. इस जंग में लगे जख्मों को भरने में शायद इतने साल लग जाएं, जितने में कई सरकारें बदल सकती हैं. सीजफायर के बाद इन देशों की रिकवरी पर भी बात करेंगे, एक्सप्लेनर में...
सवाल 1: ईरान के जख्म ज्यादा गहरे, कितने समय में भरेंगे?जवाब: इस जंग का सबसे ज्यादा असर ईरान पर पड़ा है. ईरान की लीडरशिप लगभग खत्म हो गई है. सुप्रीम लीडर आयतुल्लाह अली खामेनेई 28 फरवरी 2026 को तेहरान में एयरस्ट्राइक में मारे गए. उनके साथ डिफेंस मिनिस्टर अजीज नसीरजादेह, IRGC कमांडर मोहम्मद पाकपुर, इंटेलिजेंस चीफ इसमाइल खतीब, अली लारीजानी और दर्जनों अन्य टॉप कमांडर मारे गए. कुल मिलाकर ईरान ने 40 से ज्यादा सीनियर अधिकारियों को खो दिया. अब मुज्तबा खामेनेई को नया सुप्रीम लीडर चुना गया है, लेकिन पूरी कमान व्यवस्था को फिर से खड़ा करने में कई सालों लगेंगे.
न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ईरान की न्यूक्लियर साइट्स तबाह हो गईं. नतांज, फोर्डो, इस्फहान और बुशहर जैसी जगहों पर बार-बार हमले हुए. अमेरिकी और इजरायली हमलों ने इन साइटों के एंट्रेंस, टनल्स और इक्विपमेंट को भारी नुकसान पहुंचाया. एक्सपर्ट्स कहते हैं कि ईरान का न्यूक्लियर प्रोग्राम पहले ही 2025 के हमलों से पीछे धकेल दिया गया था. अब यह और कई साल पीछे चला गया है. अगर ईरान दोबारा बनाना चाहे तो बिना बाहर की मदद के 5 से 10 साल या उससे ज्यादा लग सकते हैं, लेकिन सैंक्शन्स के चलते मदद मिलना मुश्किल है.
ईरान का इंसानी नुकसान भी भारी है. ईरानी स्वास्थ्य मंत्रालय के अनुसार 3,000 से ज्यादा लोग मारे गए, जबकि कुछ रिपोर्ट्स 7,300 से ऊपर की मौतें बता रही हैं. इसमें सिविलियन और मिलिट्री दोनों शामिल हैं. 26,000 से ज्यादा घायल हुए. कई अस्पताल तबाह हुए. स्कूलों पर हमले हुए, जिसमें मिनाब की लड़कियों के स्कूल पर हमले में 175 से ज्यादा बच्चे मारे गए. 65 स्कूल और 32 मेडिकल फैसिलिटी को निशाना बनाया गया. 10,000 से ज्यादा सिविलियन बिल्डिंग्स, ब्रिज, रेलवे, पेट्रोकेमिकल प्लांट्स (साउथ पार्स गैस फील्ड) और डेसैलिनेशन प्लांट्स डैमेज हुए. पानी और बिजली की सप्लाई बाधित हुई.
इकोनॉमी की बात करें तो ईरान की अर्थव्यवस्था पहले से कमजोर थी. अब तेल निर्यात रुक गया और फैक्टरियां ध्वस्त हो गईं. न्यूयॉर्क पोस्ट की रिपोर्ट के मुताबिक, ग्लोबल इकोनॉमिक इम्पैक्ट के कारण ईरान को सैकड़ों अरब डॉलर का नुकसान हुआ. यह सब दोबारा बनाने के लिए अकेले इंफ्रास्ट्रक्चर पर दसियों अरब डॉलर लगेंगे. अगर बातचीत में सैंक्शन्स हटे तो 3-5 साल में कुछ हद तक सुधर सकता है, लेकिन न्यूक्लियर और मिलिट्री पावर को पूरी तरह बहाल करने में 10 साल या उससे ज्यादा लग सकते हैं.
सवाल 2: सीजफायर का ऐलान करने वाले अमेरिका को रिकवरी की जरूरत?जवाब: अमेरिका पर नुकसान सीमित रहा. 15 सैनिक मारे गए और 500 से ज्यादा घायल हुए. मिडिल ईस्ट के 17 बेस पर करीब 800 मिलियन डॉलर का नुकसान हुआ, लेकिन अमेरिका की इकोनॉमी मजबूत है. युद्ध की कुल मिलिट्री कॉस्ट 84 मिलियन डॉलर से ऊपर पहुंच चुकी है. रोजाना सैकड़ों मिलियन डॉलर खर्च हो रहे थे. हथियारों की खपत भारी थी, लेकिन अमेरिका के पास रिसोर्सेज हैं.
रिकवरी? मिलिट्री इक्विपमेंट को रिप्लेस करने में कुछ महीने लगेंगे. घायल सैनिकों की लंबी देखभाल सालों तक चलेगी, लेकिन कुल मिलाकर अमेरिका के जख्म 1-2 साल में भर जाएंगे. इकोनॉमिकली तो तेल की कीमतें बढ़ने से उसे फायदा भी हुआ, क्योंकि वह नेट एक्सपोर्टर है.
सवाल 3: अमेरिका के दम पर ईरान से लड़ने वाले इजरायल के जख्म कब भरेंगे?जवाब: इजरायल ने भी इस जंग में नुकसान झेला है. 12 सैनिक और 27 सिविलियन मारे गए, जबकि 7,000 से ज्यादा लोग घायल हुए. ईरानी मिसाइलों से घर, फैक्टरियां और इंफ्रास्ट्रक्चर डैमेज हुआ. एक हफ्ते में ही 3 बिलियन डॉलर का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा, लेकिन इजरायल की इकोनॉमी रेजिलिएंट है. लेबनान के साथ अलग युद्ध अभी भी चल रहा है, लेकिन मुख्य ईरान फ्रंट पर सीजफायर से राहत मिली.
इजरायल को इंफ्रास्ट्रक्चर रिपेयर में 6-12 महीने लग सकते हैं. इकोनॉमिक रिकवरी तेज होगी यानी 1-2 साल में पूरा असर मिट जाएगा.
सवाल 4: अमेरिका, इजरायल और ईरान के अलावा किन देशों को गहरे जख्म लगे?जवाब: ईरान के अलावा सबसे गहरे जख्म लेबनान को लगे, जहां इजरायल और हिजबुल्लाह के बीच लड़ाई से 1,530 से ज्यादा लोग मारे गए. 4,812 घायल हुए और लाखों लोग विस्थापित हो गए. अस्पताल, स्कूल, घर और इंफ्रास्ट्रक्चर बुरी तरह तबाह हुए, जिसे दोबारा बनने में कई साल लगेंगे.
गल्फ कंट्रीज में UAE को सबसे ज्यादा नुकसान हुआ, जहां ईरानी मिसाइल और ड्रोन हमलों से दुबई-अबू धाबी के एयरपोर्ट, होटल, तेल सुविधाएं और थुराया टेलीकॉम बिल्डिंग क्षतिग्रस्त हुईं, 13 मौतें हुईं और सैकड़ों घायल हुए. कुवैत में तेल और पावर प्लांट्स पर हमलों से 10 मौतें, 100 से ज्यादा घायल और बड़े इंफ्रास्ट्रक्चर नुकसान हुआ. बहरीन में 3 मौतें और 40 से ज्यादा घायल, कतर में गैस सुविधाओं पर हमले से 4 घायल और LNG उत्पादन प्रभावित हुआ, जबकि सऊदी अरब में तेल सुविधाओं पर मिसाइल हमलों से 2 मौतें, घायल और पूर्वी प्रांत में ऊर्जा साइट्स क्षतिग्रस्त हुईं.
इन सभी गल्फ देशों की तेल-गैस उत्पादन, रिफाइनरी और बंदरगाह बुरी तरह प्रभावित हुए. इराक में 100 से ज्यादा मौतें हुईं, अमेरिकी बेस और ईरान समर्थित मिलिशिया के हमलों से बिजली उत्पादन रुका. जॉर्डन में भी कुछ हमले हुए जिसमें घायल रिपोर्ट हुए, जबकि तुर्किये के इंसिरलिक एयर बेस के पास ड्रोन गिराए गए लेकिन बड़ा नुकसान नहीं हुआ.
स्ट्रेट ऑफ होर्मुज के बंद होने से पूरे क्षेत्र की अर्थव्यवस्था को अरबों डॉलर का झटका लगा. गल्फ देशों में निर्यात रुका, जिससे वैश्विक महंगाई बढ़ी. कुल मिलाकर, लेबनान को मानवीय और इंफ्रास्ट्रक्चर के मामले में सबसे गंभीर नुकसान हुआ, जबकि गल्फ देशों (UAE, कुवैत, बहरीन, कतर, सऊदी) को तेल-आधारित अर्थव्यवस्था पर भारी असर पड़ा, हालांकि इनकी मजबूत अर्थव्यवस्था की वजह से रिकवरी तेज हो सकती है, लेकिन लेबनान जैसे कमजोर देशों के जख्म भरने में 5-10 साल या उससे ज्यादा समय लग सकता है.
सवाल 5: तीनों देशों के पास रिकवरी के बेहतर ऑप्शन क्या हैं?जवाब: फॉरेन एक्सपर्ट और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए. के. पाशा कहते हैं कि सबसे जरूरी है कि सीजफायर स्थायी बने. इस्लामाबाद की बातचीत में न्यूक्लियर प्रोग्राम, सैंक्शन्स, सुरक्षा गारंटी और क्षेत्रीय शांति पर सहमति बने. ईरान को अंतरराष्ट्रीय मदद (UN, EU या पड़ोसी देशों से) मिलनी चाहिए ताकि रिकवरी तेज हो. अमेरिका और इजरायल को भी सैंक्शन्स हटाने और आर्थिक सहयोग पर विचार करना चाहिए. मौतों और तबाही के घाव मानसिक रूप से भी गहरे हैं, इसलिए काउंसलिंग और सहायता जरूरी है. अगर शांति बनी रही तो ईरान 5-10 साल में काफी हद तक उबर सकता है, जबकि अमेरिका-इजरायल 1-2 साल में, लेकिन अगर बातचीत फेल हुई तो जख्म और गहरे हो सकते हैं.'
