Explained: ईरान-अमेरिका समझौते में किसकी जीत और किसे मिली हार, दुनिया के लिए क्यों अहम है यह डील?
US Iran Peace Deal: अमेरिका और इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहे हैं. उनका आरोप रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है.

अमेरिका और ईरान के बीच संभावित शांति समझौते की खबर ने पूरी दुनिया का ध्यान अपनी ओर खींच लिया है. रिपोर्ट्स के मुताबिक, दोनों देशों ने एक-दूसरे पर हमले रोकने और तनाव कम करने पर सहमति बनाई है. साथ ही, होर्मुज स्ट्रेट को जहाजों के लिए खुला रखने पर भी सहमति बनाने की बात कही जा रही है.
इस समझौते का सबसे बड़ा मतलब यह है कि पश्चिम एशिया में पिछले कई महीनों से मंडरा रहा बड़े युद्ध का खतरा फिलहाल टलता दिख रहा है. होर्मुज स्ट्रेट दुनिया के सबसे अहम तेल व्यापार के रास्तों में से एक है. अगर यह बंद होता, तो तेल और गैस की वैश्विक सप्लाई प्रभावित होती, जिससे भारत समेत दुनिया भर में ईंधन की कीमतें बढ़ सकती थीं.
हालांकि, इस डील के कई अहम सवाल हैं जिसके जवाब अभी आने बाकी हैं. अमेरिका और इजरायल लंबे समय से मांग करते रहे हैं कि ईरान अपने परमाणु कार्यक्रम और बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम पर रोक लगाए. लेकिन अब तक यह स्पष्ट नहीं है कि समझौते में ईरान ने इन मुद्दों पर कितनी रियायत दी है.
युद्ध के बाद अचानक समझौते की नौबत क्यों?
अमेरिका और इजरायल लंबे समय से ईरान के परमाणु कार्यक्रम को लेकर चिंतित रहे हैं. उनका आरोप रहा है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे बढ़ रहा है. इसी वजह से ईरान के परमाणु ठिकानों, मिसाइल कार्यक्रम और उसके क्षेत्रीय प्रभाव को रोकना अमेरिका-इजरायल की प्राथमिकता रही है.
दूसरी ओर, ईरान लगातार कहता रहा है कि उसका परमाणु कार्यक्रम शांतिपूर्ण उद्देश्यों के लिए है. लेकिन हालिया सैन्य टकराव के बाद दोनों पक्षों को यह एहसास हुआ कि युद्ध लंबा खिंचने पर नुकसान सभी को होगा. यही वजह है कि बातचीत की राह खुली.
इस समझौते में अमेरिका क्या चाहता है?
अमेरिका की सबसे बड़ी चिंता ईरान का परमाणु कार्यक्रम है. वॉशिंगटन चाहता है कि ईरान परमाणु हथियार बनाने की दिशा में आगे न बढ़े. इसके अलावा अमेरिका यह भी चाहता है कि खाड़ी क्षेत्र में समुद्री व्यापार सामान्य बना रहे और तेल आपूर्ति बाधित न हो.
अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के लिए यह समझौता एक बड़ी कूटनीतिक उपलब्धि के रूप में भी देखा जा रहा है. यदि युद्ध रोककर ईरान को बातचीत की मेज पर लाया जाता है, तो इसे उनकी विदेश नीति की सफलता माना जाएगा.
ईरान को क्या मिलेगा?
ईरान लंबे समय से आर्थिक प्रतिबंधों और अंतरराष्ट्रीय दबाव का सामना कर रहा है. उसकी अरबों डॉलर की संपत्तियां विदेशों में फ्रीज हैं. समझौते के तहत इन संपत्तियों को मुक्त करने की संभावना जताई जा रही है.
इसके अलावा ईरान चाहता है कि उसके खिलाफ सैन्य दबाव कम हो और क्षेत्र में उसकी रणनीतिक स्थिति कमजोर न पड़े. तेहरान के लिए यह समझौता आर्थिक राहत और राजनीतिक वैधता दोनों ला सकता है.
होर्मुज स्ट्रेट क्यों है सबसे बड़ा मुद्दा?
दुनिया के लगभग पांचवें हिस्से का तेल व्यापार होर्मुज स्ट्रेट से होकर गुजरता है. युद्ध के दौरान इसके बंद होने की आशंका से वैश्विक बाजारों में चिंता बढ़ गई थी. यदि यह मार्ग खुला रहता है, तो तेल और गैस की सप्लाई सामान्य बनी रहेगी. भारत, चीन, जापान और यूरोप जैसे बड़े आयातक देशों के लिए यह बेहद महत्वपूर्ण है. यही कारण है कि दुनिया इस समझौते को सिर्फ सुरक्षा नहीं बल्कि आर्थिक नजरिए से भी देख रही है.
इजरायल क्यों असहज है?
इस पूरे समझौते का सबसे दिलचस्प पहलू इजरायल की प्रतिक्रिया है. इजरायल का मानना है कि यदि ईरान का बैलिस्टिक मिसाइल कार्यक्रम और क्षेत्रीय नेटवर्क जस का तस बना रहता है, तो केवल परमाणु समझौता उसकी सुरक्षा चिंताओं को दूर नहीं करेगा. इजरायल को डर है कि समझौते के बाद ईरान आर्थिक रूप से और मजबूत हो सकता है. यही वजह है कि वहां के कई राजनीतिक नेता इस डील को लेकर सवाल उठा रहे हैं. प्रधानमंत्री बेंजामिन नेतन्याहू पर भी घरेलू दबाव बढ़ सकता है क्योंकि युद्ध के दौरान घोषित कई रणनीतिक लक्ष्य अभी अधूरे दिखाई देते हैं.
क्या फिर से बिगड़ सकता है माहौल?
यह भी सच है कि यह समझौता नाजुक है. प्रियंकर उपाध्याय के मुताबिक, इस डील में अभी भी कई सवाल बाकी हैं:
- सबसे बड़ा खतरा इजरायल है. ट्रंप ने साफ कहा कि वह नेतन्याहू से नाराज हैं और उनका कहना है कि 'इजरायल को लेबनान में और हमले नहीं करने चाहिए, खासकर उस दिन जब हम शांति समझौते के बेहद करीब थे.' हालांकि, डील टिक गई, लेकिन अगर इजरायल फिर से कोई सैन्य कार्रवाई शुरू करता है, तो ईरान या हिजबुल्लाह तुरंत जवाब दे सकते हैं.
- ईरानी सुप्रीम नेशनल सिक्योरिटी काउंसिल ने भी साफ कर दिया है कि 'जब तक अमेरिकाअपने वादे पूरे करने का भरोसा नहीं देता, तब तक आखिरी बातचीत टलती रहेगी.' इसका मतलब है कि जब तक पैसा भारत के खाते में नहीं आता, तब तक कोई भरोसा नहीं है.
- इसके अलावा, ट्रंप खुद दावा करते हैं कि 'ईरान कभी परमाणु हथियार हासिल नहीं करेगा.' लेकिन इंटरनेशनल एटॉमिक एनर्जी एजेंसी (IAEA) के मुताबिक, ईरान के पास 440.9 किलोग्राम यूरेनियम है जो 60% शुद्धता तक एनरिच्ड है. यह हथियार-ग्रेड (90%) स्तर से केवल एक तकनीकी कदम दूर है. अगर 60 दिनों के भीतर इस पर कोई समाधान नहीं निकलता है, तो यह डील फिर से बिखर सकती है.





















