अमेरिका और ईरान के बीच लंबे समय से चल रहा तनाव अब कम होता हुआ दिखाई दे रहा है. दोनों देशों के बीच शांति समझौते की दिशा में प्रगति की खबरें सामने आई हैं. इस पूरे घटनाक्रम पर दुनिया की नजर बनी हुई थी, लेकिन इस कहानी में एक और देश लगातार चर्चा में रहा और वह है पाकिस्तान. इस्लामाबाद में हुई बातचीत से लेकर जून 2026 में सामने आए समझौते तक पाकिस्तान ने मध्यस्थ की भूमिका निभाई. सबसे पहले पाकिस्तान के प्रधानमंत्री शहबाज शरीफ ने समझौते की जानकारी दी. इसके बाद अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने भी इसकी पुष्टि की और फिर ईरानी अधिकारियों ने भी पाकिस्तान की कोशिशों की सराहना की. ऐसे में सबसे बड़ा सवाल यह है कि पाकिस्तान को इस भूमिका से क्या फायदा हो सकता है.
पाकिस्तान के लिए यह एक बड़ी उपलब्धि मानी जा रही है. पिछले कई वर्षों से पाकिस्तान आर्थिक संकट, राजनीतिक अस्थिरता और सुरक्षा चुनौतियों का सामना कर रहा है. ऐसे समय में पहली बार उसे एक बड़े अंतरराष्ट्रीय विवाद में मध्यस्थ के रूप में देखा गया है. अमेरिका और ईरान जैसे दो विरोधी देशों के बीच बातचीत का रास्ता बनाने से उसकी अंतरराष्ट्रीय छवि को फायदा मिल सकता है. इससे भविष्य में उसकी कूटनीतिक स्थिति मजबूत होने की संभावना भी बढ़ सकती है.
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ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन
पाकिस्तान के लिए सबसे बड़ा संभावित लाभ एक पुराने ऊर्जा प्रोजेक्ट से जुड़ा माना जा रहा है. यह परियोजना ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन है, जो करीब तीन दशक से अधूरी पड़ी हुई है. लंबे समय से इसे पाकिस्तान की ऊर्जा जरूरतों को पूरा करने वाली महत्वपूर्ण योजना माना जाता रहा है. अब अगर अमेरिका और ईरान के रिश्तों में सुधार होता है और प्रतिबंधों में राहत मिलती है तो इस परियोजना को आगे बढ़ाने का रास्ता खुल सकता है. ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन की योजना 1990 के दशक में बनाई गई थी. शुरुआत में इस परियोजना का उद्देश्य ईरान, पाकिस्तान और भारत को एक गैस पाइपलाइन से जोड़ना था. बाद में भारत इस योजना से अलग हो गया और यह परियोजना केवल ईरान और पाकिस्तान तक सीमित रह गई. इस योजना के तहत ईरान के बड़े प्राकृतिक गैस भंडार से पाकिस्तान तक गैस पहुंचाई जानी थी, जिससे वहां के उद्योगों को ईंधन मिलता, बिजली उत्पादन में मदद होती और देश का ऊर्जा संकट कम हो सकता था.
अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध
ईरान-पाकिस्तान गैस पाइपलाइन परियोजना के सामने सबसे बड़ी बाधा ईरान पर लगे अमेरिकी आर्थिक प्रतिबंध रहे. इन प्रतिबंधों के कारण पाकिस्तान लगातार अंतरराष्ट्रीय दबाव में रहा और वह अपने हिस्से की पाइपलाइन का निर्माण आगे नहीं बढ़ा सका. दूसरी ओर, ईरान अपनी सीमा के भीतर इस परियोजना का बड़ा हिस्सा तैयार कर चुका है. अब हालात बदलते हुए दिखाई दे रहे हैं. अमेरिका और ईरान के बीच बातचीत में तेल प्रतिबंधों में राहत, आर्थिक सहयोग और आगे परमाणु मुद्दों पर वार्ता जैसे विषय शामिल बताए जा रहे हैं. यदि आने वाले 60 दिनों की बातचीत सफल रहती है और प्रतिबंधों में ढील मिलती है तो पाकिस्तान के लिए इस गैस पाइपलाइन परियोजना को दोबारा शुरू करने का अवसर मिल सकता है.
पाकिस्तान के लिए बड़ा मौका
पाकिस्तान के लिए यह केवल एक निर्माण परियोजना नहीं बल्कि उसकी ऊर्जा सुरक्षा से जुड़ा बड़ा मुद्दा है. देश लंबे समय से ऊर्जा संकट का सामना कर रहा है. बिजली उत्पादन की लागत अधिक है, प्राकृतिक गैस की कमी बनी रहती है और ऊर्जा आयात पर विदेशी मुद्रा का बड़ा हिस्सा खर्च करना पड़ता है. यदि पाकिस्तान को ईरान से पाइपलाइन के जरिए अपेक्षाकृत सस्ती गैस मिलने लगती है तो उसकी ऊर्जा लागत कम हो सकती है और विदेशी मुद्रा भंडार पर पड़ने वाला दबाव भी घट सकता है. इसलिए इस संभावित समझौते को पाकिस्तान के लिए आर्थिक और रणनीतिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण माना जा रहा है.
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