28 फरवरी 2026 को अमेरिका के ईरान पर युद्ध करने के बाद से दुनियाभर में उथल-पुथल मची है. इसमें ईरान से ज्यादा नुकसान अमेरिका का हो रहा है. दुनिया के सबसे ताकतवर देश को एक नॉन-न्यूक्लियर पावर वाले देश ने टक्कर देकर वर्ल्ड ऑर्डर हिला दिया है. एक्सपर्ट्स का मानना है कि अब अमेरिका की यूनीपोलर वाली छवि टूट रही है और सभी देश मल्टीपोलर की तरफ बढ़ रहे हैं. तो क्या रूस लेगा अमेरिका की जगह और कैसे बनेगा मल्टीपोलर वर्ल्ड ऑडर? एक्सप्लेनर में समझें...

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सवाल 1: अमेरिका और ईरान जंग वर्ल्ड ऑर्डर को कैसे बदल रही है?जवाब: अमेरिका और ईरान के बीच युद्ध शुरू होने से पहले कया लगाए जा रहे थे कि अगर ऐसा युद्ध हुआ तो दुनिया की सत्ता का संतुलन हमेशा के लिए बदल जाएगा. अब यही हो रहा है. ईरान ने 27 अमेरिकी सैन्य ठिकानों पर हमला किया, जिसमें कम से कम 17 बुरी तरह तबाह हुए. THAAD जैसे एडवांस्ड मिसाइल डिफेंस सिस्टम को नुकसान पहुंचा. अमेरिकी एयरक्राफ्ट कैरियर USS अब्राहम लिंकन और USS जेराल्ड आर. फोर्ड को पीछे हटना पड़ा. ईरान ने डॉलर से अलग होकर युआन में ट्रेड शुरू किया. होर्मुज स्ट्रेट बंद होने से दुनिया की एनर्जी सप्लाई 20% प्रभावित हुई.

नतीजा? कई देश अपनी सुरक्षा के लिए अमेरिका पर पूरी तरह भरोसा नहीं कर रहे यानी अब अमेरिका की यूनीपोलर इमेज टूट गई है.

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ट्रंप कई बार ईरान युद्ध खत्म करने का ऐलान कर चुके, लेकिन नतीजे नहीं दिखे

सवाल 2: अमेरिका-ईरान जंग में रूस का नाम क्यों उठ रहा है?जवाब: रूस पहले से ही यूक्रेन युद्ध के बावजूद एनर्जी का बड़ा खिलाड़ी है. 5 अप्रैल 2026 को होर्मुज संकट में रूस और सऊदी अरब ने OPEC+ मीटिंग में फैसला लिया कि मई 2026 से तेल उत्पादन बढ़ाने में दोनों 60% से ज्यादा योगदान देंगे. रूस सऊदी और दूसरे गल्फ देशों को 'अच्छे दोस्त' बता रहा है. क्रेमलिन के प्रवक्ता दिमित्री पेसकोव ने कहा कि रूस गल्फ देशों के साथ संबंध मजबूत करना चाहता है. ईरान युद्ध में रूस अमेरिका के खिलाफ बैलेंस बनाने में मदद कर रहा है. BRICS और SCO जैसे मंचों पर रूस-भारत-चीन का समन्वय बढ़ रहा है. रूस की वजह से मल्टीपोलर वर्ल्ड तेजी से आकार ले रही है, जहां अमेरिका अकेला नहीं चलेगा.

सवाल 3: भारत और सऊदी अरब रूस से क्या बातचीत कर रहे हैं?जवाब: भारत होर्मुज संकट के कारण रूस से लिक्विफाईड नेचुर गैस (LNG) आयात बढ़ाने की बात कर रहा है. रूस के तेल का भारत में शेयर पहले 39% था, अब होर्मुज बंद होने पर रूस फिर से महत्वपूर्ण स्रोत बन गया है.

सऊदी अरब भी रूस के साथ OPEC+ में मिलकर तेल उत्पादन का फैसला कर रहा है. दोनों देश रूस को ऊर्जा सुरक्षा के लिए देख रहे हैं. रूस-भारत की साझेदारी रक्षा, ऊर्जा और कूटनीति में मजबूत है. सऊदी अरब भी अमेरिका पर निर्भरता कम करने के लिए रूस की ओर झुककर संतुलन बना रहा है.

 

OPEC+ में 12 सदस्यीय देश हैं

सवाल 4: 60 देशों की बैठक क्या थी और इसका मकसद क्या था?जवाब: 2-3 अप्रैल 2026 को ब्रिटेन की अगुवाई में 60 से ज्यादा देशों की वर्चुअल बैठक हुई. इसमें भारत के विदेश सचिव विक्रम मिश्री शामिल थे. फ्रांस, जर्मनी, इटली, कनाडा और UAE ने भी हिस्सा लिया. बैठक का मकसद होर्मुज स्ट्रेट को दोबारा खोलने का 'प्लान B' तैयार करना था.

इस बैठक में 'सुरक्षित और निरंतर खुला होर्मुज' पर जोर दिया गया. भारत ने 'अबाधित नेविगेशन' पर जोर दिया. एक्सपर्ट्स का मानना है कि ये बैठक साफ दिखाती है कि देश अब अमेरिका पर अकेले भरोसा नहीं करना चाहते. अगर अमेरिका पीछे हट गया तो बिना अमेरिकी मदद के डिप्लोमैटिक और आर्थिक तरीके से शिपिंग बहाल करने के रास्ते ढूंढे गए.

 

ब्रिटेन की 60 देशों वाली बैठक में करीब 40 से ज्यादा देश शामिल हुए थे

सवाल 5: यह बदलाव पुराने वर्ल्ड ऑर्डर को कैसे प्रभावित कर रहा है?जवाब: पुराना वर्ल्ड ऑर्डर  टूट रहा है. ईरान ने दिखाया कि छोटा देश भी सुपरपावर को चुनौती दे सकता है. रूस-चीन-भारत जैसे देश BRICS+ और SCO के जरिए नया बैलेंस बना रहे हैं. सऊदी अरब जैसे गल्फ देश अब 'मल्टी-अलाइनमेंट' कर रहे हैं. अमेरिका के साथ भी, रूस-चीन के साथ भी.

मुस्लिम मिरर की रिपोर्ट के मुताबिक, ये आर्थिक युद्ध है, जहां डॉलर की ताकत पर सवाल उठ रहे हैं. दुनिया अब 'क्षेत्रीय प्रभाव क्षेत्र' (spheres of influence) की ओर बढ़ रही है, लेकिन भारत जैसे मध्य शक्तियां (middle powers) बीच में बैलेंस बना रही हैं.

होर्मुज स्ट्रेट से भारत LPG का 80-85% आयात करता है. संकट में घरेलू LPG सुरक्षित रखा गया, लेकिन कमर्शियल सेक्टर पर दबाव है. दिल्ली ने 26 मार्च को 4500 सिलेंडर रोजाना का आवंटन बढ़ाया. रूस से तेल और LNG बढ़ाने से राहत मिल रही है. भारत ने 60 देशों की बैठक में सक्रिय भूमिका निभाई. PM मोदी ने लोकसभा में कहा कि ऊर्जा सुरक्षा के लिए 41 देशों से आयात विविधीकरण कर रहे हैं. रूस-भारत की पुरानी दोस्ती अब और मजबूत हो रही है.

सवाल 6: तो क्या वर्ल्ड ऑर्डर यूनीपोलर से बदलकर मल्टीपोलर हो जाएगा?    जवाब: विदेश मामलों के जानकार और JNU के रिटायर्ड प्रोफेसर ए. के. पाशा कहते हैं, 'होर्मुज स्ट्रेट के खुलने के 10-12 महीनों तक जंग का असर रहेगा. रूस, भारत और सऊदी अरब की बातचीत जारी रहेगी. 60 देशों की बैठक जैसी कोशिशें बढ़ेंगी यानी दुनिया अब मल्टीपोलर की तरफ काफी हद तक बढ़ चुकी है. अमेरिका के हाथ से यूनीपोलर का तमगा जाने के पीछे ट्रंप का बड़ा हाथ है. उन्होंने कई जंगें रुकवाने के वादों से लेकर टैरिफ तक के खेल खेले. इसमें नुकसान पूरे देश का हुआ. अब साफ है कि कोई एक देश नहीं चलेगा.'

ए. के. पाशा का मानना है कि ऐसे में भारत को रूस के साथ ऊर्जा साझेदारी बढ़ानी होगी, साथ ही सऊदी अरब और UAE से भी एनर्जी के लिए बातचीत करनी होगी. ये संकट सिर्फ तेल का नहीं, नई विश्व व्यवस्था का जन्म है. रूस फिर से अहम हो रहा है. भारत को स्मार्ट तरीके से बैलेंस बनाने की जरूरत है.