अमेरिका से हो गई बड़ी चूक, भारत के साथ ट्रेड डील की फैक्टशीट में गलती से जोड़ा ‘गूगल टैक्स’, बाद में उठाया ये कदम
USA U-Turn on Google Tax: व्हाइट हाउस की शुरुआती फैक्टशीट में लिखा था कि भारत 'अपना डिजिटल सर्विस टैक्स हटा देगा' लेकिन संशोधित संस्करण में यह लाइन हटा दी गई.

भारत ने डिजिटल विज्ञापन पर लगने वाला 6% इक्वलाइजेशन लेवी, जिसे आमतौर पर 'गूगल टैक्स' कहा जाता है, भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क की घोषणा से काफी पहले ही खत्म कर दिया था. हालांकि व्हाइट हाउस की एक शुरुआती फैक्टशीट में यह संकेत दिया गया था कि यह कदम द्विपक्षीय व्यापार समझौते का हिस्सा है. बाद में जब फैक्टशीट में बदलाव हुआ, तो इस पर फिर से चर्चा शुरू हो गई.
कब हटाया गया था टैक्स?
डिजिटल विज्ञापन सेवाएं देने वाली विदेशी टेक कंपनियों पर लगने वाला 6% टैक्स फाइनेंस बिल 2025 में संशोधन के जरिए हटाया गया. यह फैसला 1 अप्रैल 2025 से लागू हुआ. यानी यह कदम भारत-अमेरिका ट्रेड फ्रेमवर्क सामने आने से करीब 10 महीने पहले उठा लिया गया था.
फैक्टशीट में क्या बदला?
व्हाइट हाउस की शुरुआती फैक्टशीट में लिखा था कि भारत 'अपना डिजिटल सर्विस टैक्स हटा देगा' लेकिन संशोधित संस्करण में यह लाइन हटा दी गई. अब सिर्फ इतना कहा गया है कि भारत डिजिटल व्यापार से जुड़े नियमों पर बातचीत करने के लिए प्रतिबद्ध है.
क्या था ‘गूगल टैक्स’?
इक्वलाइजेशन लेवी 2016 में लागू की गई थी. इसके तहत भारत में विज्ञापन से कमाई करने वाली विदेशी डिजिटल कंपनियों पर 6% टैक्स लगाया जाता था, भले ही उनकी भारत में कोई भौतिक मौजूदगी न हो. इसका मकसद डिजिटल कारोबार से होने वाली कमाई पर टैक्स सुनिश्चित करना था.
क्यों हटाया गया टैक्स?
सरकारी अधिकारियों ने उस समय कहा था कि यह कदम अमेरिका के साथ व्यापार तनाव कम करने के लिए उठाया गया. अमेरिका लंबे समय से इस टैक्स को अपनी टेक कंपनियों के खिलाफ भेदभावपूर्ण बताता रहा था. उद्योग से जुड़े लोगों ने भी बताया था कि गूगल और मेटा जैसी कंपनियां इस टैक्स का बोझ भारतीय विज्ञापनदाताओं पर डाल रही थीं, जिससे डिजिटल मार्केटिंग की लागत बढ़ रही थी.
अब आगे क्या?
भारत पहले ही 2024 में गैर-निवासी ई-कॉमर्स कंपनियों पर लगने वाला 2% इक्वलाइजेशन लेवी भी हटा चुका है. हालांकि अमेरिकी पक्ष चाहता था कि भविष्य में ऐसे टैक्स दोबारा न लगाए जाएं, लेकिन भारतीय सलाहकारों ने कहा कि टैक्स नीति तय करना देश का अधिकार है और इसे किसी व्यापार समझौते में बांधा नहीं जाना चाहिए.
Source: IOCL

























