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पाकिस्तान में शिया नरसंहार की 20 साल पुरानी कहानी, जब आतंकी हमलों की भेंट चढ़े 777 मुसलमान

Islamabad Bomb Blast: पाकिस्तान में साल 2009 से अब तक शिया समुदाय के 777 लोग आतंकवाद की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं. सांप्रदायिक आतंकी नेटवर्क पूरे पाकिस्तान में फैला हुआ है.

पाकिस्तान की राजधानी इस्लामाबाद में शुक्रवार (6 फरवरी 2026) को तरलाई कलां इलाके में स्थित शिया मस्जिद कैसर खदीजातुल कुबरा में आत्मघाती धमाका हुआ. यह 20 सालों से पाकिस्तान में शिया समुदाय पर हो रहे आतंकी हमलों की 22वीं कड़ी है. इस हमले में 50 लोगों की मौत हुई और कम से कम 169 लोग घायल हुए हैं. साल 2009 से अब तक शिया समुदाय के 777 लोग पाकिस्तान में आतंकवाद की वजह से अपनी जान गंवा चुके हैं. मौजूदा घटना ने एक बार फिर इस सच्चाई को सामने लाया है कि पाकिस्तान में शिया समुदाय के खिलाफ सांप्रदायिक आतंक न तो खत्म हुआ है और न ही आकस्मिक है घटना, बल्कि यह दशकों से चली आ रही एक निरंतर समस्या है.

इस्लामाबाद में मस्जिद के एंट्री गेट के पास धमाका

इस्लामाबाद, जिसे पाकिस्तान का सबसे सुरक्षित और कड़ी निगरानी वाला इलाका माना जाता है वहां के बाहरी क्षेत्र में शिया नमाजियों को निशाना बनाया जाना देश की गहरी विफलता को उजागर करता है. अधिकारियों के मुताबिक धमाका मस्जिद के एंट्री गेट के पास उस समय हुआ जब जुमे की नमाज के लिए बड़ी संख्या में लोग इकट्ठा हो रहे थे. यह वही पैटर्न है जो पाकिस्तान में पहले भी कई बार आतंकी हमलों केआर दौरान देखा गया जब आतंकी किसी मजहबी स्थल पर ज्यादा से ज्यादा जान लेने के लिए हमला करते हैं.

पाकिस्तान में शिया नरसंहार की 20 साल पुरानी कहानी

पिछले बीस सालों में पाकिस्तान के अलग-अलग हिस्सों में शिया मस्जिदों, इमामबाड़ों, जुलूसों, अस्पतालों, बसों और सार्वजनिक स्थानों पर आत्मघाती धमाके, टारगेट किलिंग और सामूहिक हत्याएं होती रही हैं. ऐतिहासिक दृष्टि से भी बलूचिस्तान, खैबर पख्तूनख्वा, पंजाब, कराची और अब इस्लामाबाद तक कहीं भी शिया समुदाय सुरक्षित नहीं रहा और हजारा शिया, तीर्थयात्री, मौलवी और आम नमाजी लगातार इस हिंसा का शिकार बने हैं. यह सिलसिला साबित करता है कि यह सुरक्षा चूक नहीं, बल्कि सांप्रदायिक आतंकी संगठनों को मिली लंबे समय से चली आ रही छूट का नतीजा है.

2009-10 के आत्मघाती हमले में कई लोगों की मौत

पाकिस्तान में 21वीं सदी में शिया समुदाय पर हमले का पहला बड़ा मामला 2009 में ही सामने आ गया था जब 5 फरवरी 2009 को डेरा गाजी खान में शिया मस्जिद में आत्मघाती धमाके में 32 लोगों की मौत हुई. इसके बाद 20 फरवरी को शिया नेता शेर जमान के जनाजे के दौरान हमला हुआ, जिसमें 30 लोग मारे गए और 157 घायल हुए. फिर अप्रैल 2010 में चकवाल की शिया मस्जिद में हमला हुआ जिसमें 22 लोगों की जान गई. इतना ही नहीं सितंबर 2010 में लाहौर में शिया जुलूस को निशाना बनाकर कई धमाके किए गए, जिनमें 30 नागरिक मारे गए और उसी साल हंगू में शिया संचालित अस्पताल पर आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें 16 लोगों की मौत हुई.

क्वेटा और रहीम यार खान में कितने शिया मुस्लिमों की मौत?

इसके बाद 2011 और 2012 में हमलों का केंद्र हजारा शिया और धार्मिक जुलूस बन गए जहां सबसे पहले अगस्त 2011 में ईद-उल-फितर के दिन क्वेटा में मस्जिद के बाहर हुए धमाके में 11 हजारा शिया मारे गए फिर 2012 में पासबान-ए-जाफरिया के नेता अस्करी रजा की टारगेट किलिंग हुई. रहीम यार खान में चेहलुम जुलूस पर बम धमाके में 18 लोगों की मौत हुई और कोहिस्तान में शिया यात्रियों की बस पर हमला कर 18 नागरिकों को मार दिया गया. साथ ही इसी साल मनसेहरा में 20 शिया मुसलमानों की सामूहिक हत्या की गई.

2013 सांप्रदायिक हिंसा का सबसे खौफनाक साल साबित हुआ, जब 10 जनवरी को क्वेटा में दोहरे धमाकों में 115 लोगों की मौत और 270 से ज्यादा लोग घायल हुए. कुछ ही हफ्तों बाद हंगू की शिया मस्जिद में आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें 19 लोग मारे गए और फिर 16 फरवरी को क्वेटा में हजारा शियाओं पर आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें 91 लोगों की जान गई. 3 मार्च को कराची की शिया मस्जिद के बाहर धमाके में 63 लोग मारे गए. इन हमलों ने यह दिखा दिया कि सांप्रदायिक आतंकी नेटवर्क पूरे पाकिस्तान में फैले हुए हैं.

कराची-पेशावर में आत्मघाती हमला

इसके बाद भी खून-खराबा रुका नहीं. जनवरी 2015 में शिकारपुर की शिया मस्जिद में धमाके में 61 नमाजियों की मौत हुई. फरवरी 2015 में पेशावर की शिया मस्जिद पर हमले में 19 लोग मारे गए. मई 2015 में कराची में शिया यात्रियों की बस पर हमला कर 46 लोगों को मार दिया गया और मार्च 2017 में पाराचिनार में बम धमाके में 24 लोगों की मौत और 70 घायल हुए.

हाल के वर्षों में भी हालात नहीं बदले पहले मार्च 2022 में पेशावर की शिया मस्जिद में आत्मघाती हमला हुआ, जिसमें 63 लोगों की जान गई. इसके बाद जुलाई 2023 में झोब आर्मी बेस पर हमले के बाद इलाके में सांप्रदायिक तनाव और सुन्नी-शिया झड़पें हुईं, जिससे यह साफ हुआ कि आतंकी हिंसा अब भी सामाजिक विभाजन को हवा दे रही है और मार्च 2025 में झाल मगसी में पीर राखेल शाह दरगाह पर हुए आतंकी हमले में 35 शिया तीर्थयात्री मारे गए.

पूरे पाकिस्तान में फैला सांप्रदायिक आतंक

इसके बाद 6 फरवरी 2026 को इस्लामाबाद में हुआ हमला इस बात का सबूत है कि पाकिस्तान में सांप्रदायिक आतंक अब पाकिस्तान की राजधानी तक पूरी तरह पहुंच चुका है. यह हमला उस दावे को पूरी तरह ध्वस्त करता है कि ऐसी हिंसा केवल सीमावर्ती या अस्थिर इलाकों तक सीमित है. लगातार होती इन घटनाओं से यह साफ है कि पाकिस्तान का शिया समुदाय आज भी व्यवस्थित रूप से निशाना बनाया जा रहा है और सुरक्षा देने के बजाए हर हमले के बाद धीरे-धीरे भुला दिया जाता है, जबकि इन नरसंहारों के लिए जिम्मेदार कट्टरपंथी विचारधाराएं और नेटवर्क पाकिस्तान की सुरक्षा संरचना में अब भी मौजूद हैं.

शिवांक मिश्रा साल 2020 से पत्रकारिता के क्षेत्र में सक्रिय हैं और इस वक्त एबीपी न्यूज़ में बतौर प्रिंसिपल कॉरेस्पॉन्डेंट कार्यरत हैं. उनकी विशेषज्ञता साइबर सुरक्षा, इन्वेस्टिगेटिव रिपोर्टिंग और जनहित से जुड़े मामलों की गहन पड़ताल में है. कनाडा में खालिस्तानी आतंकियों के शरण मॉड्यूल से लेकर भारत में दवा कंपनियों की अवैध वसूली जैसे विषयों पर कई महत्वपूर्ण खुलासे किए हैं. क्रिकेट और फुटबॉल देखना और खेलना पसंद है.
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