नेपाल-तिब्बत सीमा के पास ग्लेशियर टूटने के कारण आई भयानक बाढ़ के दौरान द काठमांडू पोस्ट के एक पत्रकार अर्जुन पौडेल ने अपने बचपन के गांव को अपनी आंखों के सामने गायब होते देखा. उन्होंने बताया कि बुधवार सुबह मैं काठमांडू में कांतिपुर पब्लिकेशन्स के ऑफिस जा रहा था, तभी मेरी पत्नी का फोन आया. उसने कहा, "त्रिशूली नदी में बाढ़ आ गई है. सोल बाजार और बेट्रावती में कुछ हुआ है. लोग कह रहे हैं कि वहां कुछ भी नहीं बचा है. सब लोग सड़क पर आ गए हैं."
उन्होंने बताया कि मुझे अपनी पत्नी की बात पर यकीन नहीं हुआ. सोल मेरा गांव है. मैं वहां की गलियों में खेला हूं और सालों तक रोज स्कूल जाने के लिए वहां की सड़क पर चला हूं. अगर उस जगह के बारे में किसी को पता होना चाहिए तो वह मैं हूं. उन्होंने कहा कि सोल ऐसी बस्ती नहीं है जहां नदी का पानी पहुंचता हो, यहां तक कि खराब मॉनसून में भी नहीं. उन्होंने बताया कि न्यूज मीटिंग होने के कारण मैं जल्दी में आगे बढ़ गया.
त्रिशूली नदी में जबरदस्त बाढ़उन्होंने बताया कि इसके बाद मुझे जल्द ही पता चला कि वहां सब कुछ अब खत्म हो चुका है. अर्जुन पौडेल ने कहा कि मैंने अपनी पत्नी की बात की सच्चाई जानने के लिए एक न्यूज़ साइट खोली, हालांकि मुझे ज़्यादा उम्मीद नहीं थी. त्रिशूली नदी में जबरदस्त बाढ़ की खबर पढ़कर मेरा दिल बैठ सा गया. मैंने निरंजन (पत्रकार) को फोन किया, जिनका परिवार सोले बाज़ार में रहता है. मैंने कहा कि मैं किसी से भी संपर्क नहीं कर पा रहा हूं. न मम्मी से, न बुवा से, न चाचा-चाची से किसी का फोन भी नहीं बज रहा है.
44 साल में कभी नहीं आई बाढ़अर्जुन पौडेल ने बताया कि ऑफिस तक बाकी रास्ते में हम एक-दूसरे को फोन करते रहे और घर के सभी नंबरों पर कोशिश करते रहे. कोई भी कॉल नहीं लगी. मेरे बड़े भाई की पत्नी ने बताया कि गांव में अब कुछ नहीं बचा है. ज़्यादातर लोग चले गए हैं. मुझे इस बात पर यकीन ही नहीं हो रहा था. सोल और तुपचे गांव नदी के तल से लगभग सौ मीटर ऊपर बसे हैं. इससे पहले कभी भी बाढ़ का पानी इतनी ऊंचाई तक नहीं पहुंचा था. मैं 44 साल का हूं और इतने समय में मैंने कभी नदी को हमारी तरफ बढ़ते नहीं देखा था.
'सब बाढ़ में बह गए'उन्होंने बताया कि मेरी सबसे बड़ी बुआ बह गईं. उनके साथ उनका बेटा और उनकी पत्नी भी बह गए. मुझे बताया गया कि मेरी दूसरी बुआ भी नहीं रहीं. उनका पोता सिजन और उसकी पत्नी भी उसी पानी की चपेट में आ गए. उनका अपना बेटा और बहू भी लापता हैं, उनका कोई पता नहीं चल पा रहा है. मेरे मामा उस सुबह मवेशियों के लिए घास काटने गए थे वे भी नहीं लौटे.
अर्जुन ने बताया कि मैंने वार्ड अध्यक्ष रवींद्र नेपाल को फोन किया. उन्होंने बताया कि कुछ लोग चट्टान पर चढ़कर बच गए. मैंने पास के ही एक स्कूल के टीचर से संपर्क किया. उन्होंने कहा कि मुझे अपना परिवार नहीं मिल रहा है. बेत्रावती के 90 प्रतिशत घर बह गए हैं. उन्होंने आगे बताया कि निरंजन के चाचा का फोन आया तो उन्होंने बताया कि निरंजन के पिता, मां, चाचा, बुआ और उसकी छोटी बहन सब पानी में बह गए. उन्होंने कहा कि अर्जुन हम सब खत्म हो गए हैं.
उन्होंने बताया कि बेत्रावती सिर्फ एक कस्बाभर नहीं था बल्कि यहीं पर नेपाल और तिब्बत के बीच युद्ध के बाद शांति समझौता हुआ था. यहां उत्तर गंगा धाम है, जो एक पवित्र जगह है. हर साल हज़ारों लोग पुष्य अमावस्या पर अपने मृत परिजनों को श्रद्धांजलि देने यहां आते हैं. लेकिन अब न कोई सड़क बची है, न बिजली, न फ़ोन सिग्नल और न ही इंटरनेट. बाढ़ ने त्रिशूली हाइड्रोपावर स्टेशन के हेडगेट और पावर स्टेशन को भी बहा दिया.
'मेरे अपने घर का क्या हाल, मुझे नहीं पता'अर्जुन ने बताया कि 2010-11 में जब पूरे देश में बिजली कटौती होती थी, तब भी हमारे गांव में कभी बिजली नहीं गई. अब पूरा जिला अंधेरे में है. जो ग्रामीण उस सुबह मुख्यालय आए थे, वे अब वहीं फंस गए हैं और उनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है. इलाज के लिए आए बीमार लोग अस्पताल में फंसे हैं और घर नहीं लौट पा रहे हैं. मेरा एक पड़ोसी बत्तार में सेना के ट्रेनिंग सेंटर जाने वाले रेस्क्यू हेलिकॉप्टर के पास खड़ा होकर उसमें चढ़ने की गुहार लगा रहा था. वह बार-बार कह रहा था कि मेरे चाचा और चाची बह गए. उनके फोन बंद हैं. मुझे तो यह भी नहीं पता कि मेरे अपने घर का क्या हाल है.
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