Middle East War: अमेरिका- ईरान की जंग से कच्चे तेल की कीमतों में लगी आग! भारत में पेट्रोल-डीजल होगा महंगा?
Middle East War: मिडिल ईस्ट छि़ड़ी जंग के बीच होर्मुज जलडमरूमध्य बंद कर दिया गया है, जिसकी वजह से तेल कीमतों में 12 फीसदी का उछाल देखने को मिला है. जानें भारत पर इसका क्या असर होगा.

मिडिल ईस्ट में बढ़ते युद्ध का असर अब सीधा ग्लोबल एनर्जी मार्केट पर दिख रहा है. खासकर Strait of Hormuz (होर्मुज जलडमरूमध्य) के बंद होने से स्थिति और गंभीर हो गई है. यह समुद्री मार्ग दुनिया के लिए बेहद अहम है, क्योंकि यहीं से लगभग 20 फीसदी वैश्विक कच्चे तेल और एलएनजी (LNG) का व्यापार होता है. इसके रुकने से अंतरराष्ट्रीय बाजार में तेल की सप्लाई प्रभावित हुई है.
होर्मुज जलडमरूमध्य के बंद होने से मौजूदा स्थिति का अंदाजा इस बात से लगाया जा सकता है कि सिर्फ छह दिनों में कच्चे तेल की कीमतों में करीब 12 फीसदी की बढ़ोतरी हुई है. 26 फरवरी 2026 को 1 बैरल तेल की कीमत 71.06 थी. 2 मार्च को कीमत बढ़कर 77.75 डॉलर प्रति बैरल पहुंच गई. वहीं 3 मार्च को 79.60 डॉलर प्रति बैरल कच्चे तेल की कीमत हो गई है. तेल की कीमतों में इस उछाल का असर भारतीय रुपये पर भी दिख रहा है, जिससे आयात लागत बढ़ रही है.
भारत पर सीधा असर
भारत अपनी जरूरत का लगभग 50 फीसदी तेल होर्मुज जलडमरूमध्य से आयात करता है. ऐसे में इस रास्ते के बंद होने से देश की ऊर्जा सुरक्षा पर बड़ा असर पड़ सकता है. विशेषज्ञों के मुताबिक, कच्चे तेल की कीमत में हर 1 डॉलर की बढ़ोतरी से भारत के सालाना आयात बिल में 1.8 से 2 अरब डॉलर तक का इजाफा हो सकता है. अगर कीमतें लंबे समय तक ऊंची रहती हैं तो महंगाई बढ़ सकती है और पेट्रोल-डीजल के दाम भी ऊपर जा सकते हैं.
बढ़ता सैन्य संघर्ष
रिपोर्ट के अनुसार, युद्ध के पहले चार दिनों में 1,000 से ज्यादा ठिकानों पर हमले हुए और 555 लोगों की मौत हुई. इससे क्षेत्र में अनिश्चितता बढ़ी है और एनर्जी मार्केट में घबराहट साफ दिख रही है.
भारत की तैयारी और विकल्प
भारत के पास फिलहाल करीब 74 दिनों का कच्चा तेल भंडार (Oil Reserves) है. ये बयान तेल मंत्री हरदीप सिंह पुरी ने दिया था. हालांकि, आम तौर पर 90 दिनों का ऑयल स्टोरेज होना चाहिए, लेकिन भारत के पास 74 दिन का स्टॉक है. इस स्थिति में अगर युद्ध लंबा चलता है तो भारत पर इसका असर कम देखने को मिलेगा. वहीं इसके अलावा स्थिति बिगड़ने के समय भारत रूस जैसे वैकल्पिक स्रोतों से आयात बढ़ाने की संभावना पर भी विचार कर सकता है, ताकि सप्लाई बनी रहे. अगर हालात जल्दी सामान्य नहीं हुए तो इसका असर सिर्फ मिडिल ईस्ट तक सीमित नहीं रहेगा, बल्कि पूरी दुनिया की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा.
Source: IOCL

























