US Iran Peace Deal: यूएस और ईरान के बीच 110 दिनों तक चली लंबी और तनावपूर्ण जंग के बाद आखिरकार एक समझौता हो गया, लेकिन इस डील ने जितनी राहत दी है, उतने ही सवाल भी खड़े कर दिए हैं. सबसे बड़ा सवाल यह है कि जिस संघर्ष में इजरायल की भूमिका अहम मानी जा रही थी, उसी इजरायल की इस डील की टेबल से गैर-मौजूदगी क्यों रही. यही वजह है कि इस समझौते को लेकर वैश्विक स्तर पर चर्चा और बहस तेज हो गई है.

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इस बीच ईरान के सुप्रीम लीडर मोइजतबा खामनेई ने इस समझौते पर पहली बार खुलकर प्रतिक्रिया दी है. उन्होंने साफ शब्दों में कहा कि यदि अमेरिकी पक्ष किसी भी तरह की अत्यधिक या अनुचित मांगें करता है, तो ईरान उन्हें किसी भी हालत में स्वीकार नहीं करेगा. उन्होंने यह भी कहा कि अब से ईरान, उसकी जनता और खुद वह इस समझौते की शर्तों के सही तरीके से लागू होने का इंतजार करेंगे. उनके इस बयान से साफ संकेत मिलता है कि ईरान इस डील को लेकर सतर्क भी है और पूरी तरह भरोसे की स्थिति में भी नहीं है..

यूएस-ईरान डील पर बोले मोइजतबा

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मोइजतबा खामनेई ने आगे बताया कि इस मुकाम तक पहुंचने के लिए ईरानी अधिकारियों ने गंभीरता और सद्भावना के साथ लगातार प्रयास किए. हालांकि उन्होंने यह भी इशारा किया कि अमेरिकी राष्ट्रपति ने इस समझौते को हासिल करने के लिए हर तरह के दबाव और साधनों का इस्तेमाल किया. यह बयान कहीं न कहीं इस बात को भी दर्शाता है कि यह डील केवल बातचीत का परिणाम नहीं, बल्कि दबाव और शक्ति संतुलन की भी उपज है.

उन्होंने यह भी स्वीकार किया कि व्यक्तिगत रूप से उनका इस मुद्दे पर अलग नजरिया था, लेकिन ईरान के राष्ट्रपति और सर्वोच्च राष्ट्रीय सुरक्षा परिषद के प्रमुख के रूप में दिए गए आश्वासन के बाद उन्होंने इस समझौते को मंजूरी दी. उन्हें भरोसा दिलाया गया कि ईरानी राष्ट्र और ‘रेजिस्टेंस फ्रंट’ के हितों और अधिकारों की पूरी तरह रक्षा की जाएगी, और इसी भरोसे के आधार पर उन्होंने अपनी सहमति दी.

सामने-सामने यूएस-ईरान

इसी कड़ी में अमेरिका और ईरान के बीच आगे की बातचीत की प्रक्रिया भी शुरू हो रही है. दोनों देशों के प्रतिनिधि स्विट्जरलैंड के बुर्गेनस्टॉक पर्वतीय रिसॉर्ट में मुलाकात करने वाले हैं, जहां इस समझौते को लागू करने को लेकर शुरुआती चर्चा होगी. स्विस विदेश मंत्रालय ने इस बैठक का स्वागत करते हुए इसे क्षेत्रीय तनाव कम करने की दिशा में एक महत्वपूर्ण कदम बताया है, हालांकि अभी इसके एजेंडे और विस्तृत कार्यक्रम को सार्वजनिक नहीं किया गया है.

दूसरी ओर अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने इस समझौते को अपनी बड़ी कूटनीतिक जीत बताया है. उनका दावा है कि इस डील के जरिए मध्य पूर्व में बड़े युद्ध का खतरा टल गया है, होर्मुज स्ट्रेट दोबारा खुल गया है और ईरान को परमाणु हथियार हासिल करने से रोका जा सका है. ट्रंप ने यह भी कहा कि यह समझौता सैन्य दबाव और कूटनीति के संयुक्त प्रयासों का परिणाम है.

क्या है संकेत?

हालांकि, ट्रंप के इन दावों के बीच कुछ संकेत ऐसे भी मिले हैं जो बताते हैं कि अमेरिका अब ईरान के नागरिक परमाणु कार्यक्रम को सीमित शर्तों के साथ स्वीकार करने के लिए तैयार हो सकता है. उन्होंने खुद माना कि बिजली उत्पादन के लिए कुछ हद तक परमाणु ऊर्जा की जरूरत हो सकती है, लेकिन साथ ही उन्होंने यह भी सवाल उठाया कि इतने बड़े तेल और गैस भंडार होने के बावजूद ईरान को परमाणु ऊर्जा की जरूरत क्यों है.

यह समझौता जहां एक ओर युद्ध के अंत और कूटनीतिक समाधान की दिशा में बड़ा कदम माना जा रहा है, वहीं दूसरी ओर यह भी साफ है कि दोनों पक्षों के बीच अविश्वास पूरी तरह खत्म नहीं हुआ है. इजरायल की गैर-मौजूदगी, ईरान की सख्त चेतावनी और अमेरिका के दावे ये सभी संकेत देते हैं कि यह डील अंत नहीं, बल्कि एक नई भू-राजनीतिक कहानी की शुरुआत है.

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