यूरोप में चिलचिलाती धूप के कारण तापमान के पुराने रिकॉर्ड लगातार टूट रहे हैं और पूरा महाद्वीप भीषण गर्मी की चपेट में है. मंगलवार और बुधवार को फ्रांस में इतिहास के सबसे गर्म दिन दर्ज किए गए, जहां पश्चिमी हिस्सों में तापमान 39 से 43 डिग्री सेल्सियस तक पहुंच गया. बुधवार ब्रिटेन के इतिहास में जून का सबसे गर्म दिन रहा और तापमान 36.1 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. शुरुआती आंकड़ों के अनुसार, स्पेन, जर्मनी, ऑस्ट्रिया, नीदरलैंड और स्विट्जरलैंड में भी जून के तापमान के कई रिकॉर्ड टूटे हैं.

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इस बीच, फ्रांस में भीषण गर्मी से राहत पाने की कोशिश में डूबने वाले दर्जनों लोगों समेत कई लोगों की मौत हुई है. समुद्र की सतह का वैश्विक तापमान फिर रिकॉर्ड स्तर पर पहुंच गया है. ऑस्ट्रेलिया के मौसम विभाग ने आधिकारिक तौर पर अलनीनो की स्थिति बनने की पुष्टि की है, जिससे ऑस्ट्रेलिया, एशिया और दक्षिण प्रशांत क्षेत्र में सामान्य से अधिक गर्म और शुष्क मौसम रहने की आशंका है. भारत और पाकिस्तान भी भीषण गर्मी का सामना कर रहे हैं.

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असामान्य गर्मी

लगातार तीन या उससे अधिक दिनों तक सामान्य से काफी अधिक तापमान दर्ज होने की स्थिति को हीटवेव कहा जाता है. वैज्ञानिकों के अनुसार, इस बार यूरोप की गर्मी दो कारणों से अधिक चिंताजनक है- इसका समय और इसकी गंभीरता.

समय से पहले

यूरोप में सबसे अधिक गर्मी सामान्यतः जुलाई के मध्य से आखिर तक पड़ती है, लेकिन अब भीषण गर्मी जून में ही शुरू हो रही है. 1950 के बाद यह केवल दूसरी बार है जब हीटवेव अपने चरम मौसम से कई सप्ताह पहले पहुंची है. एक अध्ययन के अनुसार, यदि मानव-जनित ग्रीनहाउस गैसों का प्रभाव न होता तो जून 2025 जैसी गर्मी 50 वर्ष में एक बार आती, लेकिन 1.3 डिग्री सेल्सियस वैश्विक तापमान वृद्धि के कारण अब ऐसी स्थिति हर पांच वर्ष में देखने को मिल सकती है.

टूटते रिकॉर्ड

यदि जलवायु परिवर्तन नहीं हुआ होता, तो इतनी जल्दी और इतनी तीव्र गर्मी संभव नहीं थी. मंगलवार और बुधवार फ्रांस में 1947 के बाद सबसे गर्म दिन रहे. पूरे देश का औसत तापमान 29.9 डिग्री सेल्सियस दर्ज किया गया. मंगलवार को 147 शहरों में जून का सर्वाधिक तापमान रिकॉर्ड हुआ और 41 मौसम केंद्रों पर पारा 43 डिग्री सेल्सियस से ऊपर पहुंच गया. दोनों रातें भी सबसे गर्म रहीं, जबकि स्पेन में कुछ स्थानों पर तापमान 45 डिग्री सेल्सियस के पार पहुंच गया और लगातार तीन रात न्यूनतम तापमान 30 डिग्री सेल्सियस या उससे अधिक रहा.

जलवायु का असर

वैज्ञानिकों के अनुसार, लंबे समय तक बने उच्च वायुदाब वाले क्षेत्र गर्म हवा को सतह के पास रोक लेते हैं, जबकि जीवाश्म ईंधनों से बढ़ता जलवायु परिवर्तन हीटवेव की तीव्रता और अवधि दोनों बढ़ा रहा है. 1950 से 1999 के बीच यूरोप में केवल पांच बड़े हीटवेव दौर आए थे, जबकि 2000 से 2025 के बीच इनकी संख्या 20 से अधिक हो चुकी है. यूरोपियन क्लाइमेट रिस्क असेसमेंट के अनुसार, दक्षिणी यूरोप में भीषण गर्मी जनस्वास्थ्य के लिए गंभीर खतरा बन चुकी है. यदि अलनीनो का प्रभाव भी बना रहा, तो 2026 और 2027 में वैश्विक औसत तापमान रिकॉर्ड स्तर के करीब रह सकता है. बदलती जलवायु में अत्यधिक गर्मी अब पूरी दुनिया के लिए स्वास्थ्य, पर्यावरण और अर्थव्यवस्था से जुड़ा वैश्विक संकट बन चुकी है.

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